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CG News: नन्हीं आंखों पर खतरा, बच्चों की आंखों पर मोतियाबिंद का साया, डॉक्टरों ने अब तक 10 के आंखों की रोशनी लौटाई

CG News: अक्सर मोतियाबिंद को बुज़ुर्गों की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह समस्या बच्चों में भी हो सकती है। बच्चों की आंखों पर मोतियाबिंद होने से आंख का लेंस धुंधला हो जाता है, जिससे उनकी देखने की क्षमता प्रभावित होती है। अगर समय रहते इसका पता न चले और इलाज न हो, तो बच्चे […]

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CG News: नन्हीं आंखों पर खतरा, बच्चों की आंखों पर मोतियाबिंद का साया, डॉक्टरों ने अब तक 10 के आंखों की रोशनी लौटाई

बच्चों की आंखों पर मोतियाबिंद का साया (Photo AI Image)

CG News: अक्सर मोतियाबिंद को बुज़ुर्गों की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह समस्या बच्चों में भी हो सकती है। बच्चों की आंखों पर मोतियाबिंद होने से आंख का लेंस धुंधला हो जाता है, जिससे उनकी देखने की क्षमता प्रभावित होती है। अगर समय रहते इसका पता न चले और इलाज न हो, तो बच्चे की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए कमजोर हो सकती है। इसलिए बच्चों में मोतियाबिंद के लक्षणों को पहचानना और समय पर उपचार बेहद जरूरी है। ऐसा ही एक मामला बस्तर के आदिवासी बहुल इलाके से सामने आया है।

बच्चों की आंखों पर आनुवांशिक मोतियाबिंद का साया गहराता जा रहा है। वंशानुगत कारणों से जन्म के साथ या बचपन में ही विकसित होने वाली यह बीमारी बच्चों की रोशनी छीन लेती है, लेकिन महारानी अस्पताल के डॉक्टरों ने सर्जरी से कई मासूमों को नई जिंदगी दी है। पिछले साल डॉक्टरों ने 10 बच्चों की आंखों की रोशनी सफलतापूर्वक लौटा दी है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे की आंखों में सफेद धब्बा, धुंधलापन या रोशनी परेशानी दिखे तो तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में जांच कराएं। सर्जरी से न केवल रोशनी लौटती है, बल्कि बच्चे का भविष्य भी रोशन हो जाता है।

9 माह में 7 बच्चों का ऑपरेशन, रोशनी लौटाई

महारानी अस्पताल में पिछले 9 महीनों में 7 बच्चों का जन्मजात मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन किया गया। इन सभी बच्चों में बीमारी का कारण आनुवांशिक पाया गया। नेत्र सर्जन डॉ. सरिता थामस ने बताया कि बस्तर में अन्य जिलों की तुलना में मोतियाबिंद के मामले ज्यादातर वंशानुगत हैं। यदि माता-पिता या परिवार में किसी को बचपन में यह बीमारी रही हो तो जीन के जरिए यह बच्चे में पहुंच जाती है। कुछ मामलों में जन्म के समय ही जीन म्यूटेशन हो जाता है, जिससे मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है। समय पर सर्जरी से इन बच्चों की दृष्टि पूरी तरह वापस आ जाती है।

6 से 15 साल तक के बच्चों में हो रही यह बीमारी ज्यादा

डॉक्टरों के अनुसार मोतियाबिंद से पीड़ित बच्चों की उम्र ज्यादातर 6 से 15 साल के बीच है। इस आयु वर्ग में लड़के-लड़कियों की संख्या लगभग बराबर है। महारानी से अस्पताल के आंकड़ों में पिछले तीन साल में 22 बच्चों का सफल ऑपरेशन किया गया। हाल ही में कुरंदी गांव के 11 साल के खोमेश्वर कश्यप का भी ऑपरेशन सफल रहा, जिससे उसकी दोनों आंखों की रोशनी वापस आ गई।

8 माह में 1800 बच्चों का ऑपरेशन लक्ष्य 4500

बस्तर में बच्चों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन महारानी अस्पताल में तेजी से हो रहे हैं। डॉ. थामस अकेले महारानी अस्पताल में यह जिम्मेदारी संभाल रही हैं, जबकि मेकाज में चार डॉक्टरों की टीम काम कर रही है। पिछले 8 महीनों में दोनों अस्पतालों में मिलाकर 1800 बच्चों का ऑपरेशन पूरा हो चुका है। इस साल कुल 4500 बच्चों के ऑपरेशन का लक्ष्य रखा गया है। डॉक्टरों का कहना है कि जागरूकता और समय पर जांच से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

डॉक्टर का बयान

जगदलपुर के महारानी अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ का कहना है, “अक्सर लोग समझते हैं कि मोतियाबिंद सिर्फ बुज़ुर्गों को होता है, लेकिन बच्चों में भी यह समस्या जन्म से या बाद में हो सकती है। अगर बच्चे की आंखों में सफेदी, धुंधलापन या देखने में परेशानी दिखे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। समय पर सर्जरी और सही इलाज से बच्चे की आंखों की रोशनी पूरी तरह बचाई जा सकती है।

बच्चों का बयान

  • पहले मुझे बोर्ड साफ नहीं दिखता था, सब धुंधला लगता था। अब इलाज के बाद मैं ठीक से पढ़ पा रहा हूँ।
  • रोशनी में आंखों में चुभन होती थी और चीजें पहचानने में दिक्कत आती थी, डॉक्टर को दिखाने के बाद अब आंखें ठीक हो रही हैं।
  • मुझे खेलते समय गेंद ठीक से नहीं दिखती थी, अब सर्जरी के बाद सब साफ दिखता है।

बच्चों में मोतियाबिंद के लक्षण

आँख में सफेदी/धुंधलापन

पुतली (काले हिस्से) का सफेद, ग्रे या धुंधला दिखना, जो अक्सर रोशनी में ज़्यादा दिखता है।

देखने में दिक्कत

वस्तुओं को ठीक से न देख पाना, चेहरों को फॉलो न कर पाना, या छोटी चीज़ें न ढूँढ पाना।

असामान्य आँखें

आँखें अलग-अलग दिशाओं में भटकना (भेंगापन) या लगातार हिलना (निस्टैग्मस), जैसा कि स्रोत 4, 5 और 6 में बताया गया है।

प्रकाश संवेदनशीलता (फोटोफोबिया)

तेज़ रोशनी में आँखें सिकोड़ना, आँखें बंद करना, या रोशनी से दूर भागना।

धीमी प्रतिक्रिया

सीखने या प्रतिक्रिया देने की गति धीमी होना, जैसे खिलौने पकड़ने में देर करना।

बचाव के उपाय

गर्भावस्था में सावधानी

  • गर्भवती महिलाओं को समय पर टीकाकरण कराना चाहिए (खासतौर पर रूबेला)।
  • संक्रमण से बचाव और नियमित जांच जरूरी है।

नवजात की आंखों की जांच

  • जन्म के तुरंत बाद और पहले साल में आंखों की जांच कराएं।
  • आंखों में सफेदी या धुंध दिखे तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

आंखों को चोट से बचाएं

  • खेलते समय बच्चों को सुरक्षित रखें।
  • तेज या नुकीली चीजों से दूरी रखें।

दवाओं का सही उपयोग

  • बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉयड दवाएं न दें।

नियमित नेत्र परीक्षण

  • स्कूल जाने वाले बच्चों की समय-समय पर आंखों की जांच कराएं।

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