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बस्तर महाराजा को देश के आखिरी चीतों में एक का सिर मिला था उपहार में, आज भी राजमहल में रखा है

- देश के आखिरी तीन चीतों में एक का सिर बस्तर के राजमहल में रखा है, उपहार में मिला था राजा को - देश में ७५ साल पहले थम गई थी चीते की रफ्तार

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बस्तर महाराजा को देश के आखिरी चीतों में एक का सिर मिला था उपहार में, आज भी राजमहल में रखा है

बस्तर महाराजा को देश के आखिरी चीतों में एक का सिर मिला था उपहार में, आज भी राजमहल में रखा है

जगदलपुर. नामीबिया से मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीते आ चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पहले आखिरी बार देश में चीता कब और कहां देखा गया था। इसकी मौत कैसे हुई थी और मौत के बाद इसका क्या हुआ। ऐसे सवालों के जवाब के लिए जब पत्रिका ने तफ्तीश की तो पता चला कि देश के आखिरी चीते का सीधा सबंध छग और यहां के बस्तर से है। बस्तर महाराजा कमलचंद भंजदेव ने बताया कि तात्कालीन मध्यप्रदेश और आज के छत्तीसगढ़ के कोरिया रियासत के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने अंबिकापुर स्थित सलका के जंगलों में चीतों का शिकार किया था। इसके बाद तीन में से एक चीते का सिर बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भेंट किया था। वह सिर आज भी बस्तर राजमहल के दरबार में शोभायमान है। वहीं, दो चीतों के पुतले कोरिया पैलेस में है।

१९४८ में आखिरी बार दिखा था, भारत सरकार ने विलुप्ति की घोषणा १९५२ में की थी
मालूम हो कि भार में आखिरी बार चीता १९४८ में देखा गया था। वह भी छत्तीसगढ़ के कोरिया इलाके में। कोरिया राजा ने इस आखिरी चीते का शिकार किया था। इसके चार साल बाद भारत सरकार ने देश से चीते की विलुप्ति की घोषणा १९५२ में कर दी थी। मालूम हो कि पिछले सवा सौ सालों में भारत सरकार द्वारा विलुप्त घोषित किया गया यह अकेला जंगली जानवर है। हालांकि बाद के दिनों में उसी इलाके में दोबारा चीता देखने का दावा लोगों ने किया पर उसकी पुष्टि नहीं हुई।

कई अहम दस्तावेज में हैं इसके प्रमाण
रणथंभौर फाउंडेशन चाणक्यपुरी नई दिल्ली द्वारा वर्ष 1997 में संकटग्रस्त वन्य जीवों पर विशेष अंक (पत्रिका) प्रकाशित किया गया था। जिसमें भारत में विलुप्त वन्यजीव चीता पर विशेष आलेख है। जिसमें उल्लेख किया गया है कि आखिरी तीन चीतों का शिकार रामानुज प्रताप सिंहदेव ने किया था। वहीं बॉंम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी के डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक भारत में तीन अंतिम चीतों को 1947 में कोरिया के रामगढ़ गांव के महाराजा ने मार गिराया था और इसके बाद इनमें से एक का सिर बस्तर महाराजा को भेंट किया गया था।

शिकार के बाद ट्राफी बनाने के लिए बेंगलुरु भेजा गया, उसके बाद आया बस्तर
कोरिया महाराज ने शिकार करने के बाद चीते के शव को संरक्षित करने की योजना बनाई। उस समय यह काम सिर्फ बेंगलुरु में होती थी। ऐसे में उन्होंने एक दल चीते के शव के साथ यहां भेजा। यहां उसे संरक्षित करने करने के लिए ट्राफी यानी पुतला बनाया गया। इसके बाद जब दल वापस लौटा तो उन्होंने बस्तर महाराजा को उपहार देने का निर्णय लिया। इसके लिए विशेष दल पहुंचा और महाराजा प्रवीणचंद को इसे सौंपा। वहीं अन्य दो ट्राफियां कोरिया महाराजा के घर में लगी हुई है।

ग्रामीणों की शिकायत पर राजा ने किया था शिकार
ग्रामीणों ने आदमखोर जंगली जानवर की शिकायत रामानुज प्रताप सिंहदेव से की थी। जिसके बाद महाराज शिकार के लिए निकल पड़े और उन्होंने एक साथ तीन चीतों का मार गिराया। शिकार किए गए तीनों नर चीते थे और पूरी तरह वयस्क भी नहीं हुए थे। परंपरा के मुताबिक महाराज ने तीनों मृत चीतों के साथ बंदूक लिए फोटो खिंचाई। रामानुज प्रताप सिंहदेव के निजी सचिव ने ही महाराज की तस्वीर के साथ पूरी जानकारी बॉंबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी थी।