
बस्तर जिले में नक्सल ओपरेशन की कमान सम्हाल रही है आइपीएस अंकिता शर्मा ,परीक्षाओ की तयारी में जुटे बस्तर के युवाओ के लिए प्रेरणा का श्रोत है अंकिता शर्मा
जगदलपुर. आईपीएस अंकिता कहती हैं मेरे माता-पिता की तीन संतानें थीं और तीनों बेटियां थीं। माता-पिता ने कभी बेटियों को बोझ नहीं समझा। पिता दुर्ग शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी थे। परिवार में बड़े पिताजी के बेटों के बीच खेलते-कूदते बचपन बीता। जैसा भाई खेला करते वैसा ही खेल मैं भी खेला करती। दीवार से ऊंची छलांग लगाती, भाइयोंको दौड़ा-दौड़ा कर थका डालती। बचपन से ही एक टॉम बॉय की छवि परिवार में बनी रही। माता-पिता ने भी वैसी ही परवरिश दी। कभी कोई भेद नहीं किया। अंकिता शर्मा २०१८ बैच की आईपीएस हैं। वे बताती हैं कि पहले प्रयास में वे मेन्स तक पहुंची तो दूसरे में प्री भी क्लियर नहीं हो पाया, लेकिन उन्होंने हौसला बनाए रखा और तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिली और उन्होंने सेवा के लिए होम कैडर को चुना। अंकिता की पहली पोस्टिंग बलौदाबाजार जिले में थी। इसके बाद वे रायपुर में भी रहीं और अब वे बस्तर में नक्सल ऑपरेशन को देख रही हैं।
आईपीएस बनने के बारे में कब ख्याल आया?
- मैंने आईपीएस ही बनना है ऐसा तो नहीं सोचा था लेकिन यह जरूर सोचा था कि सिविल सर्विसेस के माध्यम से समाज की सेवा जरूर करूंगी। बचपन में मम्मी कहा करती थी किरण बेदी बनना है तुझे तो जब भी मुझसे कोई पूछता कि बड़ी होकर क्या बनोगी तो मैं कहा करती कि किरण बेदी। यह जवाब मैंने हजारों बार दिया और कहतें हैं ना कि २४ घंटे में एक बार जुबान पर सरस्वती विराजित होती हैं तो वही मेरे साथ हुआ और मैं किरण बेदी की तरह आईपीएस बनी और अपनी मम्मी के सपने को पूरा किया। आईएएस के लिए अभी मेरे पास और मौके बचे हुए हैं लेकिन अब मैंने यह तय कर लिया है कि यह मेरी पहली और आख्खिरी नौकरी है। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं कि बतौर आईएएस ऑफिसर कई महिलाएं बेहतर काम कर रहीं लेकिन आईपीएस में महिलाओं की कमी है इसलिए मैंने इसे ही चुना।
बस्तर में वूमन टैलेंट को किस स्तर पर पाती हैं?
- यहां कई महिलाएं हैं जो बेहतर कर रही हैं और समाज में मिसाल बनी हैं। उन्हें देखकर और भी बेटियां प्रेरित हो रही हैं और उनकी तरह ही अपने माता-पिता और बस्तर के लिए कुछ करना चाहती हैं। मैं माता रुक्मणी संस्थान के सैनी जी से बहुत प्रभावित हुई क्योंकि वे जिस तरह से बस्तर की आदिवासी बेटियों को खेल खासकर फुटबॉल में आगे लेकर आ रहे हैं वह तारीख के काबिल है। उन्होंने अपना पूरा जीवन बस्तर की बेटियों को मुकाम दिलवाने में लगा दिया। उनका काम प्रेरणा देता है। बात करूं बस्तर के वूमन टैलेंट की तो यहां की महिलाएं आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं और वे समाज में इसके लिए खुलकर सामने आ रही हैं। यहां सबसे अच्छी बात मुझे यह दिखी कि महिलाओं को समाज समानता का अधिकार देता है।
बस्तर की बेटियों के लिए क्या किया जाना चाहिए?
- यहां बेटियों के लिए बहुत अच्छा माहौल मुझे दिखता है, लेकिन जरूरत बस उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित करने की है। इस पर स्कूल स्तर पर ही काम होना चाहिए। टीचर्स ही देखें कि कौन सी स्टूडेंट में कैसा टैलेंट है और उसे आगे दिशा दें। उसका मार्गदर्शन करें, उसे मोटिवेट करें। साथ ही माता-पिता की भी जिम्मेदारी है कि वे अपनी बेटियों को बेहतर करने के लिए प्रेरित करें। बेटियों के लिए यह माइंड सेट खत्म करना होगा कि उनकी बस शादी करनी है। माता-पिता पहले उनके करियर के बारे में सोचें।
यहां पर आप पढ़ाई और तैयारी का कैसा माहौल पाती हैं?
- बस्तर अभी शिक्षा के मामले में प्रदेश के बड़े शहरों से पीछे जरूर है लेकिन बराबरी पर आने के लिए प्रयास जारी है। रायपुर-भिलाई में अच्छे कोचिंग संस्थान हैं जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की यहां के युवा तैयारी कर रहे हैं। मौजूदा समय में ऑनलाइन क्लास का जो ट्रेंड आया है उसके माध्यम से क्रांतिकारी बदलाव आया है। ऑनलाइन क्लास के जरिए बस्तर के अंदरूनी इलाके में बैठे युवा भी यूपीएससी की तैयारी कर पा रहे हैं।
बस्तर आकर आपने नक्सल चुनौती को किस रूप में लिया?
- मैं जब रायपुर में थी तो सोचा करती थी कि बस्तर जाकर जरूर काम करना है और मैं जब यह सोच रही थी तभी बस्तर आना हो गया। यहां की चुनौतियां दूर से जैसी दिखती हैं फील्ड में उससे बिल्कुल विपरीत हैं। यहां की भगौलिक स्थिति सबसे बड़ी चुनौती है। जिसके साथ हमें ऑपरेशन में नक्सलियों का सामना करना होता है। हमारे डीआरजी के जवानों ने मेरा बहुत सहयोग किया है। जब भी हम किसी ऑपरेशन में जाते हैं तो और वापस लौटते हैं तो उनकी एक मुस्कान मुझे भरोसे के भाव से भर देती है।
नक्सलवाद से निपटने में आंध्र-तेलंगाना हमसे आगे, हम क्यों नहीं?
- नक्सलवाद की शुरुआत आंध्र-तेलंगाना में हमसे पहले हुई। जब हमारे मामले गिनती के थे। तब नक्सलवाद वहां पर चरम पर था। इसलिए मेरा माना है कि वहां पर नक्सलियों से निपटने की रणनीति पहले बनी। तकनीक का विकास हमसे पहले हुआ। इसलिए वे आज हमसे आगे हैं। हमारे यहां नक्सलवाद का चरम २००० के बाद शुरू हुआ। मैं यह दावे के साथ कह सकती हूं कि आने वाले दस साल के भीतर हम भी आंध्र-तेलंगाना की तरह नक्सलवाद को खत्म कर देंगे।
नक्सलियों में विचारधारा को कैसे देखती हैं?
- नक्सल विचारधारा सिर्फ सीसी मेंबर तक ही मुझे दिखती है। उनसे नीचे के कैडर के नक्सलियों को तो पता ही नहीं होता कि विचारधारा क्या है। उन्हें सिर्फ यही पता है कि पुलिस उनकी दुश्मन है और साम्राज्यवादी सरकार का विरोध करो। बस यही उनकी विचार धारा है। मैं तो उनकी विचारधारा को लूट-खसोट करने वाली मानती हूं। वे सिर्फ भोले-भाले ग्रामीणों बंदूक के नोक पर शोषण कर रहे हैं।
अंत में महिला दिवस पर क्या संदेश देना देंगी?
- सभी महिलाओं को आज के दिन की शुभकामनाएं। मैं आज के लिए बस यही कहूंगी कि बेटियां अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करें। यह सोचें कि उनकी मां ने जो सपना अपने लिए देखा था उसे किसी भी तरह पूरा करें। माता-पिता को भी धोखा ना दें। उनका विश्वास बनाए रखें।
Published on:
08 Mar 2022 01:15 am
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