जगदलपुर। दशहरा पर्व के समापन से पहले इलाके के सभी देवी-देवता कुटुंब जात्रा के तहत एक साथ एक ही स्थान पर शुक्रवार को एकत्र हुए। गंगामुंडा तालाब के पास िस्थत गुड़ी में देवी-देवाताओं की विदाई पूरी निष्ठा और सम्मान के साथ की गई। इस बार दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए 400 से ज्यादा देवी-देवता पहुंचे थे।
कुटुंब जात्रा में यहां देवी-देवता एक दूसरे से मिले और नृत्य किया। श्रद्धालुओं पूजा कर आशीर्वाद मांगा। इनमें बड़ेडोंगर, छोटेडोंगर, नारायणपुर, कोंडागांव सहित दक्षिण बस्तर व सीमावर्ती राज्य ओडि़शा और तेलंगाना के देवी-देवताओं के साथ अन्य जगहों से आए देवी और देवता शामिल थे। सैकड़ों वर्षो की परंपरा के अनुसार राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने इसमें मां दंतेश्वरी के पुजारी की हैसियत से पूजा अर्चना की।
ऐसा माना जाता है कि बस्तर के दशहरे में आए हुए देवी-देवता प्रसन्न होकर, बस्तर की खुशहाली और समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस जाते हैं। इस दौरान देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी मन्नतें पूरी होने पर बकरा, कबूतर, मुर्गा, बत्तख की बलि चढाई. साथ ही दशहरा समिति की ओर से सभी देवताओं के पुजारियों को ससम्मान देकर विदा किया। इस दौरान पुजारी अपने देव विग्रहों को लेकर अपने-अपने देव स्थलों की और लौट गए।
- रुसुम देकर देवी देवताओं को किया विदा
पंरपरानुसार दशहरा पर्व में शामिल होने संभाग के सभी ग्राम देवी-देवताओं को न्योता दिया जाता है, जिसके बाद पर्व की समाप्ति पर कुंटुब जात्रा की रस्म अदायगी की जाती है। देवी-देवताओं के छत्र और डोली लेकर पंहुचे पुजारियों को बस्तर राजकुमार कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति द्वारा रुसुम भी दी जाती है, जिसमें कपड़ा, पैसे और मिठाईयां होती है. बस्तर में रियासतकाल से चली आ रही यह पंरपरा आज भी बखूबी निभाई जाती है।
- माईजी जी डोली विदाई के साथ होगा दशहरा का समापन
बस्तर दशहरा के सबसे अंतिम रस्म मावली माता की विदाई पूजा व मांईजी की डोली की विदाई मंगलवार को होगी। पूजा विधान के बाद बाजे-गाजे के साथ ससम्मान मांईजी की डोली को वापस दंतेवाड़ा के लिए रवाना किया जाएगा। इसके बाद 107 दिनों तक चलने वाला दशहरा पर्व समाप्त हो जाएगा।