अपने कभी नहीं देखा होगा ऐसी चिड़िया जो इंसानों की तरह निकालती है आवाज

राजकीय पक्षी की वंंशवृद्धि के लिए जारी है सरकारी प्रयास .

जगदलपुर . छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना के संरक्षण के लिए शहर के गीदम रोड स्थित वन विद्यालय में एक बड़ा पिंजरा साल 2005 में स्थापित किया गया था। बस्तर में पाई जाने वाली पहाड़ी मैना का जुलाजिकल नाम गैकुला रिलीजिओसा पेनिनसुलारिस है। यह देश के विभिन्न हिस्सों में पाई जाने वाली मैना से भिन्न है।गीदम स्थित पिंजरे में कई पहाड़ी मैना लाकर रखे गए थे लेकिन सभी की प्राकृतिक व अन्य कारणों की वजह से कुछ सालों में मौत होती रही। हाल ही में पिंजरे में 12 साल का लंबा वक्त बिताने के बाद आर्या नाम की पहाड़ी मैना की प्राकृतिक मौत हो गई। अब इस पिंजरे में आर्या की जगह दो नए पहाड़ी मैना छोड़े गए हैं।

पहले इन्हें बड़े पिंजरे के सामने ही एक छोटे पिंजरे में रखा गया था लेकिन आर्या की पिछले दिनों मृत्यु होने के बाद इन्हें बड़े पिंजरे में छोड़ दिया गया है। वन विद्यालय के संचालक कार्यालय में पदस्थ वनपाल डमरूधर कश्यप बताते हैं कि इनकी देखरेख के लिए एक चौकीदार नियुक्त किया गया है। इन्हें कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान से लाया गया है। दोनों मैना को सोनू-मोनू नाम दिया गया है। इन्हें भोजन के रूप में सत्तु और अनार के दाने दिए जा रहे हैं। दोनों स्वस्थ हैं। बड़े पिंजरे में छोड़े जाने से इन्हें अब जंगल के जैसा महौल मिल पाएगा।

आर्या की मौत के बाद से दोनों ने कुछ भी नहीं बोला
वन विद्यालय के बड़े पिंजरे में पहाड़ी मैना आर्या की मौत कुछ दिन पहले हो गई थी। जब तक आर्या बड़े पिंजरे में थी तब तक उसे बुलाने के लिए चौकीदार आर्या की पुकार लगाता था। इसे सुनकर सोनू-मोनू भी बोलना सीख रहे थे। वे भी चौकीदार के साथ आर्या कहकर पुकारते थे। पिंजरे के चौकीदार का कहना है कि जिस दिन आर्या की मौत हुई तब से आर्या कहने पर भी वह इस शब्द को नहीं दोहराते। वनपाल डमरुधर कश्यप कहते हैं कि पक्षियों को किसी के होने या नहीं होने का एहसास तत्काल होता है। यह उसी का उदाहरण है। हालांकि दोनों ही उम्र अभी कम है और समय के साथ बातें सीखते-सीखते बोलने लगेंगे।

हूबहू इंसान की आवाज निकालने की है खासियत
पहाड़ी मैना की खासियत यह है कि यह हूबहू इंसान की तरह ही आवाज निकालती है। बस्तर में पाई जाने वाली पहाड़ी मैना का जुलाजिकल नाम गैकुला रिलीजिओसा पेनिनसुलारिस है। यह देश के विभिन्न हिस्सों में पाई जाने वाली मैना से भिन्न है। यह कांगेर घाटी, गंगालूर, बारसूरए बैलाडीला की पहाडिय़ों के अलावा ओडिशा की सीमा पर स्थित गुप्तेश्वर इलाके में ही पाई जाती है।

Click & Read More Chhattisgarh News.

Bhupesh Tripathi
और पढ़े

MP/CG लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned