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Edible Oil Price Hike: पेट्रोल, गैस के बाद तेल भी महंगा, दिहाड़ी मजदूर बोले- घर चलाना मुश्किल, देखें बढ़ोतरी का पूरा आंकड़ा

Edible Oil Price Hike in Chhattisgarh: पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के बाद अब खाने के तेल की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है, जिससे दिहाड़ी मजदूरों और निम्न आय वर्ग के परिवारों का बजट बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

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Edible Oil Price Hike

खाने के तेल की कीमत बढ़ी (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Edible Oil Price Hike: लगातार बढ़ती महंगाई ने दिहाड़ी मजदूरों और निम्न आय वर्ग के परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का सीधा असर अब आम लोगों की थाली और घरेलू बजट पर साफ दिखाई देने लगा है। रोज कमाने और रोज खाने वाले मजदूरों के लिए घर का खर्च चलाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। मजदूरी की दरें जहां लगभग स्थिर हैं, वहीं खाद्यान्न, सब्जी, तेल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।

खाने के तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी

खाने के तेल की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों के घरेलू बजट पर गहरा असर डाला है। पिछले पांच महीनों में विभिन्न ब्रांडों के खाद्य तेलों के दामों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जो तेल लगभग 135 रुपये प्रति लीटर में उपलब्ध था, उसकी कीमत अब बढ़कर 160 से 165 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। वहीं बड़े सुपरमार्केट और रिटेल स्टोर्स में कई ब्रांडों के एक लीटर तेल की कीमत 190 रुपये से 225 रुपये तक बताई जा रही है।

छोटी पैकिंग को लेकर उपभोक्ताओं में नाराजगी

तेल कंपनियां अब 1 लीटर की जगह 900 मिलीलीटर, 800 मिलीलीटर और यहां तक कि 750 मिलीलीटर तक के पाउच बाजार में उतार रही हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि पैकिंग पर स्पष्ट जानकारी न होने के कारण कई बार लोग इसे पूरा एक लीटर समझकर खरीद लेते हैं, जबकि घर पहुंचने पर पता चलता है कि मात्रा कम है।

इससे उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकाने के साथ-साथ कम मात्रा मिलने का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह तरीका ग्राहकों को भ्रमित करता है और इसे “छिपी हुई महंगाई” के रूप में देखा जा रहा है। बाजार में सस्ते विकल्प धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं, जिससे लोगों के पास सीमित और महंगे विकल्प ही बचे हैं।

कैटरिंग कारोबार पर भी असर

खाने के तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर कैटरिंग और होटल व्यवसाय पर भी पड़ा है। कैटरिंग कारोबारियों के अनुसार पिछले कुछ महीनों में उनके खर्चों में लगभग 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी है। कैटरिंग संचालक रतनदीप सिंह के अनुसार, जनवरी में 15 लीटर का टिन लगभग 2200 रुपये में मिलता था, जो अब बढ़कर 2560 रुपये तक पहुंच गया है। यह स्थिति तब है जब खरीदारी थोक दरों पर की जा रही है।

सरसों तेल समेत अन्य तेलों के दाम भी बढ़े

सिर्फ सोयाबीन, सूरजमुखी और राइसब्रान तेल ही नहीं, बल्कि सरसों तेल की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बाजार में सरसों तेल के दामों में लगभग 5 से 10 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि देखी जा रही है। थोक बाजारों में सरसों तेल की कीमत लगभग 192 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है।

महीने दर महीने कीमतों का बढ़ता ग्राफ

खाने के तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का रुझान साफ देखा जा सकता है-

  • जनवरी: 134–135 रुपये प्रति लीटर
  • फरवरी: 136–138 रुपये प्रति लीटर
  • मार्च: 142 रुपये प्रति लीटर
  • अप्रैल: 145 रुपये प्रति लीटर
  • मई: 155–160 रुपये प्रति लीटर
  • जून: 160–165 रुपये प्रति लीटर

इस बढ़ोतरी का सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा है और घरेलू खर्चों में लगातार वृद्धि हो रही है।

सुपरमार्केट में सीमित विकल्प

राजधानी रायपुर के अधिकांश बड़े स्टोर्स और सुपरमार्केट में सस्ते ब्रांड और बजट विकल्प लगभग गायब हो चुके हैं। अब केवल महंगे ब्रांड और प्रीमियम पाउच ही उपलब्ध कराए जा रहे हैं। कई जगह उपभोक्ताओं को मजबूरी में महंगे उत्पाद खरीदने पड़ रहे हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी एक लीटर तेल की कीमत 190 रुपये से 210 रुपये तक दिखाई जा रही है।

मजदूरों का दर्द

बढ़ती महंगाई पर शहर और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि पहले दिनभर की मजदूरी के बाद परिवार का खर्च किसी तरह चल जाता था, लेकिन अब आय और खर्च के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। मजदूरों को बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन और दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई के बीच दिहाड़ी मजदूरों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि मेहनत करने के बावजूद दो जून की रोटी का इंतजाम दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। ऐसे में वे सरकार से राहत और सहायक योजनाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

दाल-भात केंद्र फिर शुरू करने की मांग

मजदूरों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि गरीब और श्रमिक वर्ग को राहत देने के लिए सरकार को सस्ती भोजन योजना या दाल-भात केंद्रों को पुन: शुरू करने पर विचार करना चाहिए। उनका मानना है कि कम कीमत पर पौष्टिक भोजन उपलब्ध होने से हजारों मजदूर परिवारों को राहत मिल सकती है।

लकड़ी और भट्टी का सहारा

रसोई गैस की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवारों ने फिर से पारंपरिक चूल्हों और लकड़ी की भट्टियों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। वहीं कुछ ढाबों और छोटे भोजनालयों में भी गैस के स्थान पर तंदूर और लकड़ी आधारित भट्टियों का उपयोग बढऩे लगा है। मजदूर परिवारों का कहना है कि मजबूरी में उन्हें पुराने तरीकों की ओर लौटना पड़ रहा है।

महंगी हुई मजदूरों की थाली

कुछ समय पहले तक शहर में कई स्थानों पर मजदूरों को 40 से 50 रुपये में भरपेट दाल-चावल उपलब्ध हो जाता था, लेकिन अब भोजन की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण यह व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। बाहर भोजन करने वाले मजदूरों को पहले की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

मजदूरों की जुबानी

रामलाल कश्यप (निर्माण मजदूर) का कहना है कि पहले दिनभर काम करने के बाद परिवार के लिए राशन और सब्जी आसानी से खरीद लेते थे, लेकिन अब मजदूरी का बड़ा हिस्सा सिर्फ खाने-पीने में ही खर्च हो जाता है। बचत करना तो दूर, घर चलाना भी मुश्किल हो गया है।

मंगली बाई (घरेलू कामगार) के अनुसार, घर में गैस का उपयोग कम कर दिया है। कई बार लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च दोनों संभालना कठिन हो गया है। जबकि मजदूरी वहीं की वहीं है।

संतोष नेताम (दिहाड़ी मजदूर) का कहना है कि गैस, तेल और राशन के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ रही। कई बार काम नहीं मिलने पर परिवार के सामने भोजन जुटाने की समस्या खड़ी हो जाती है।