
बस्तर की देवगुड़ियां बनीं नेचुरल AC (photo source- Patrika)
Bastar Devgudiya: इस साल गर्मी ने देशभर में तापमान के कई रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। शहरों में गर्म हवाओं और हीटवेव ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। लेकिन इसी बीच बस्तर संभाग से राहत देने वाली एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। यहां मौजूद 8 हजार से ज्यादा देवगुड़ियां आज भी जंगलों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ प्राकृतिक कूलिंग चैंबर और ऑक्सीजन बैंक की तरह काम कर रही हैं।
देवगुड़ियां केवल पूजा-पाठ के स्थान नहीं हैं, बल्कि ये ऐसे संरक्षित वन क्षेत्र हैं जहां प्रकृति को आस्था के साथ जोड़ा गया है। घने पेड़ों और हरियाली से घिरे ये इलाके आज भी बस्तर की जलवायु को संतुलित बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
बस्तर का आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन को ही जीवन का आधार मानता है। यहां देवगुड़ियां आदिवासियों के पवित्र पूजा स्थल हैं, जिन्हें कई इलाकों में देव स्थल भी कहा जाता है। इन स्थलों पर लगे पेड़ों को देवी-देवताओं का वास माना जाता है। यही वजह है कि यहां पेड़ काटना तो दूर, जमीन पर गिरी सूखी लकड़ी या डंठल को भी बिना अनुमति उठाना परंपराओं के खिलाफ माना जाता है। वर्षों से चली आ रही इन मान्यताओं ने हजारों पेड़ों और जंगलों को बचाकर रखा है। आज जब आधुनिक विकास के नाम पर जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं, तब बस्तर की यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, देवगुड़ियों वाले इलाकों का तापमान आसपास के खुले या शहरी क्षेत्रों की तुलना में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक कम दर्ज किया गया है। जहां शहरों में कंक्रीट और पेड़ों की कटाई ने गर्मी बढ़ा दी है, वहीं देवगुड़ियों के आसपास मौजूद घने पेड़ प्राकृतिक रूप से ठंडक बनाए रखते हैं। ये क्षेत्र नमी को संरक्षित करते हैं और वातावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह पारंपरिक संरक्षण पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाए, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कभी अपनी प्राकृतिक ठंडक के लिए मशहूर जगदलपुर में अब मई और जून के दौरान तापमान 40 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने लगा है। मौसम में आए इस बदलाव ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे समय में बस्तर के आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराएं पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आ रही हैं। यहां प्रकृति पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। पेन-पुंगार यानी फूल और प्रकृति की पूजा, तथा मानसून से पहले मनाया जाने वाला माटी तिहार इसी सोच का हिस्सा हैं। इन परंपराओं के जरिए लोग प्रकृति और मिट्टी की रक्षा का संदेश देते हैं।
बस्तर में मनाया जाने वाला माटी तिहार केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का पारंपरिक अभियान है। इस दौरान लोग जमीन को नुकसान न पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह परंपरा असल में मिट्टी के कटाव को रोकने और भूमि की उर्वरता बचाने का वैज्ञानिक तरीका है। आधुनिक विज्ञान जिन बातों को आज शोध के जरिए समझा रहा है, आदिवासी समाज उन्हें सदियों से अपने जीवन में अपनाए हुए है। यही कारण है कि बस्तर के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी मिट्टी की गुणवत्ता और प्राकृतिक संतुलन बेहतर बना हुआ है।
बस्तर के जनजातीय समुदाय जंगलों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता मानते हैं। पेड़-पौधों को देवी-देवताओं का स्वरूप मानने की वजह से यहां संरक्षण की भावना पीढ़ियों से मजबूत बनी हुई है। आदिवासी समाज के लिए जंगल भोजन, जल, औषधि और संस्कृति का आधार हैं। यही कारण है कि वे प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते हैं। घुरवा समाज बस्तर संभाग के महासचिव डॉ. गंगाराम कश्यप ‘घुर’ कहते हैं कि बस्तर के आदिवासी सरल और स्वाभिमानी लोग हैं। जंगल उनके जीवन का केंद्र है। वे प्रकृति पूजक हैं और पेड़-पौधों को देवी-देवताओं का वास मानते हैं। उनके पारंपरिक ज्ञान और संरक्षण के तरीके आज पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बन सकते हैं।
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट से जूझ रही है। ऐसे समय में बस्तर की देवगुड़ियां यह संदेश दे रही हैं कि प्रकृति को बचाने के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और आस्था भी जरूरी है। बस्तर का यह मॉडल बताता है कि यदि समाज प्रकृति को अपनी संस्कृति और जीवन से जोड़ ले, तो जंगलों और पर्यावरण को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। सदियों पुरानी आदिवासी परंपराएं आज आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की सबसे मजबूत मिसाल बनकर उभर रही हैं।
Published on:
05 Jun 2026 12:58 pm
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