
बस्तर में भगवान् भी सफर में रहते हैं, आदिवासी बनाते हैं उनके के चलने के लिए वाहन
हमारे देश के लगभग सभी धर्मो में भगवान के यात्रा करने की मान्यता और उनके इस यात्रा के लिए साधन भी होते है। ग्रामीण एवं आदिवासी समुदायों में इनके विभिन्न स्वरूप होते हैं। मिटटी, धातु, लकड़ी और कपड़े आदि अनेक माध्यमों से बने ये चलायमान देवस्थान, देवी-देवताओं के आवागमन का महत्वपूर्ण साधन रहे हैं।
वर्ष भर में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब स्थानीय देवी-देवता किन्हीं अनुष्ठानों अथवा रस्मों की पूर्ती के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं। इस समय उनकी मूर्तियां किसी वाहन अथवा उपादान द्वारा लायी जाती हैं।कई मूर्तियों की जगह उनके वाहन को प्रतीकात्मक रूप से रखा जाता है
आंरभ में आदिवासी समाज एक घुमक्कड़ समाज था। वे एक जगह टिक कर नहीं रहते थे। इस कारण उनके देवस्थान भी स्थानातरित होते रहते थे।गतिमान देवस्थान बनाने की परंपरा के शुरू होने की एक बड़ी वजह ये भी रही होगी।वर्तमान में बस्तर में गांव की देवगुढ़ियों के साथ-साथ अनेक प्रकार के गतिमान देवस्थान भी बनाए जाते हैं जैसे आंगा, डोली, विमन, कुर्सी, गुटाल, कोल्हा, छत्र, डांग और बैरख।
वास्तव में आंगा क्या है, यह कोई भी आदिवासी नहीं बता पाता, वे इसके बारे में कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं।उनका हैं कि यह देव की मूर्ति नहीं है, पर इस पर देव आता है। इसी पर देव को खिलाते हैं, इसकी सहायता से देव को एक गांव से दूसरे गांव ले जाते हैं।
आंगा व्यक्गित तौर पर या समूचा गांव सामूहिक तौर पर बनवा सकता है। इसे केवल पुरुष ही उठा सकते हैं, छू सकते हैं। आमतौर पर आंगा को 12-13 वर्ष के बच्चों द्वारा ही उठवाया जाता है। मान्यता है कि देव बच्चों के आंगा उठाने से जल्दी प्रसन्न होता है।
Updated on:
26 Apr 2019 05:59 pm
Published on:
26 Apr 2019 05:55 pm
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