17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना अब इस मशीन से लैस हो करेगी जंगल की सैर, इन गतिविधियों पर रखी जाएगी नजर

वंशवृद्धि नहीं होने की वजह से विलुप्ति के कगार पर है पहाड़ी मैना की प्रजाति, इसलिए हो रहा प्रयोग

2 min read
Google source verification
राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना अब इस मशीन से लैस हो करेगी जंगल की सैर, इन गतिविधियों पर रखी जाएगी नजर

राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना अब इस मशीन से लैस हो करेगी जंगल की सैर, इन गतिविधियों पर रखी जाएगी नजर

जगदलपुर. छत्तीसगढ़ प्रदेश की राजकीय पक्षी का गौरव हासिल करने वाली पहाड़ी मैना की संख्या दिनों दिन कम होती चली जा रही है। यहां तक कि यह पक्षी विलुप्ति की कगार तक पहुंच गया है। ऐसे में इनकी वंशवृद्धि को लेकर वन अमले ने प्रयास शुरु किया था। इस प्रयास में इन पक्षियों को एक विशालकाय पिंजरा बनाकर रखा गया था। तीन दशक की मेहनत व लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी इनकी वंश वृद्धि तो दूर पिंजरे में रखी जाने वाली मैना भी एक एक कर खत्म होने लगीं।

इनकी संख्या व आदत- व्यवहारों का अध्ययन किया जा सके
अब जाकर विभाग ने यह तय किया है कि इन पक्षियों को रेडियो कालर से लैस कर मुक्त कर दिया जाए। उन्मुक्त पक्षी अपने नैसर्गिक आवास में जाएंगे जहां से इनकी गतिविधियों की पल पल की जानकारी कम्प्यूटर पर दर्ज की जाएगी। इसके साथ ही इनकी संख्या व आदत- व्यवहारों का अध्ययन किया जा सकेगा।

80 फीट ऊंचा व लंबा पिंजरा बनाया गया था
पहाड़ी मैना के कैप्टिव ब्रीडिेंग को लेकर जगदलपुर स्थित वन विद्यालय में वर्ष 1992 में में 80 फ़ीट ऊंचा गोलाकार पिंजरा बनाया गया था। यहां शुरुआत में 2 फिर 4 मैना को रखा गया था ताकि वे जोड़ा बनाकर वंशवृद्धि कर लेवें, पर ऐसा हुआ नहीं। संरक्षण और संवर्धन का प्रयास का नतीजा सिफर रहा। विडंबना यह भी है कि पक्षी विशेषज्ञ तक यह नहीं बता पाए कि विशाल पिंजरे में रखी जा रही मैना नर है कि मादा।

यह है मिमिक्री पक्षी
देश के अन्य भागों मेंं पाई जाने वाली सामान्य मैना के विपरीत बस्तर की पहाड़ी मैना विशिष्ट प्रजाति की है। यह कांगेर घाटी नेशनल पार्क, बीजापुर के इन्द्रावती टाइगर रिजर्व व दंतेवाड़ा के बारसूर इलाके में ही पाई जाती है। किसी भी सुनी ही ध्वनि की हूबहू नकल करने की वजह से पक्षी विज्ञानी इसे मिमिक्री पक्षी कहते हैं। इसी विशेषता की वजह से इसकी तस्करी होने लगी व इसकी संख्या घटती चली गई।

अभय कुमार श्रीवास्तव, चीफ कंसर्वेटर वाइल्ड लाइफ एवं परियोजना