
जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में रविवार को सत्र द गिग इकॉनमी में डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पहलुओं पर चर्चा हुई। बीते वर्ष दिसंबर में गिग वर्कर्स के विरोध, फूड डिलीवरी और कंपनियों को लेकर उठे विवाद पर भी सत्र में लेखिका व शोधकर्ता वंदना वासुदेवन, अर्थशास्त्री राकेश मोहन और लीडरशिप एक्सपर्ट केतकी कार्णिक ने चर्चा की।
सत्र में 10 मिनट डिलीवरी कल्चर पर भी सवाल उठे। वक्ताओं ने कहा कि यह सुविधा उपभोक्ताओं की अपेक्षा को बढ़ाती है, लेकिन इसकी कीमत श्रमिकों की सुरक्षा और मानसिक दबाव के रूप में चुकानी पड़ रही है।
शिकायत निवारण की मानवीय व्यवस्था खत्म
क्या गिग इकोनॉमी वास्तव में रोजग़ार सृजन का माध्यम है या यह श्रम के नए रूप में असुरक्षा और असमानता को बढ़ा रही है...इस सवाल के जवाब में वंदना वासुदेवन ने कहा कि भारत में गिग वर्क कोई नई अवधारणा नहीं है, लेकिन तकनीक ने इसमें नियंत्रण और निगरानी बढ़ा दी है। प्लेटफॉर्म कीमत तय करते हैं और उसके बाद काम बांटा जाता है। शिकायत निवारण के लिए मानवीय व्यवस्था लगभग खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि कोविड के बाद गिग प्लेटफॉर्म ने लाखों लोगों को काम दिया, लेकिन जो अस्थायी व्यवस्था थी, वह अब स्थायी रोजगार का रूप ले चुकी है, जिसमें न सुरक्षा है, न तरक्की का रास्ता।
सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देने की जरूरत
राकेश मोहन ने कहा कि गिग वर्कर्स की संख्या संगठित औद्योगिक श्रमिकों के बराबर या उससे अधिक हो रही है, इसलिए इसे मामूली क्षेत्र नहीं माना जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को प्लेटफॉर्म लेन-देन से एक तय प्रतिशत सीधे गिग वर्कर्स के सामाजिक सुरक्षा खातों (जैसे पेंशन या बीमा) में जमा कराने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे रोजगार पोर्टेबल और सुरक्षित हो सके।
केतकी कार्णिक ने गिग इकोनॉमी को बदलती कार्य-संस्कृति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि भविष्य में नौकरी नहीं, बल्कि कौशल, नेटवर्क और मानसिक लचीलापन लोगों को टिकाए रखेगा।
Updated on:
18 Jan 2026 03:19 pm
Published on:
18 Jan 2026 03:18 pm
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