
सुल्या के अरंबूर-कूटेलु में बना डॉ. गिरीश भारद्वाज का पहला सस्पेंशन ब्रिज आज भी ग्रामीण नवाचार और जनसहभागिता की मिसाल
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Bसुल्या (दक्षिण BBकन्नड़)B. एक गांव की पीड़ा, ग्रामीणों का सामूहिक संकल्प और एक युवा अभियंता का नवाचार-इन तीनों के संगम ने देश के विख्यात ‘ब्रिज मैन’ एवं पद्मश्री डॉ. गिरीश भारद्वाज की पहली झूला पुल (सस्पेंशन ब्रिज) परियोजना को जन्म दिया। सुल्या तालुक के आलेट्टी गांव के अरंबूर और कूटेलु के बीच पयस्विनी नदी पर वर्ष 1989 में निर्मित यह पुल आज भी उनके इंजीनियरिंग सफर का पहला ऐतिहासिक पड़ाव माना जाता है। इस पुल के निर्माण से पहले ग्रामीणों को पयस्विनी नदी पार करने के लिए केवल नाव का सहारा लेना पड़ता था। बरसात में नदी उफान पर होने से दोनों किनारों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता था। इसी दौरान कुशालनगर के कावेरी निसर्गधाम में बने झूला पुल से प्रेरित होकर ग्रामीणों ने अपने ही क्षेत्र के युवा अभियंता डॉ. गिरीश भारद्वाज से संपर्क किया और एक निर्माण समिति बनाकर चंदा संग्रह शुरू किया।
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Bअधिकांश निर्माण श्रमदान के माध्यम से पूरा कियाB
करीब 1.50 लाख रुपए का जनसहयोग जुटाया गया। जिला पंचायत और ग्राम पंचायत से भी आर्थिक सहायता मिली, जबकि अधिकांश निर्माण कार्य ग्रामीणों ने श्रमदान के माध्यम से पूरा किया। डॉ. भारद्वाज के तकनीकी मार्गदर्शन और ईरान से लौटे अभियंता डी.एम. सुमित्र की सलाह से दोनों किनारों पर ऊंचे पिलर बनाए गए। प्रतिकूल मौसम के बावजूद महज एक महीने में पुल तैयार हो गया।
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Bयहीं से शुरू हुई ‘ब्रिज मैन’ की यात्राB
अरंबूर-कूटेलु का यही पहला झूला पुल आगे चलकर डॉ. गिरीश भारद्वाज की उस ऐतिहासिक यात्रा की नींव बना, जिसके तहत उन्होंने देशभर में 140 से अधिक झूला पुलों का निर्माण कराया। हालांकि इस पुल पर वाहनों की आवाजाही संभव नहीं थी, इसलिए ग्रामीणों की समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। गर्मियों में लोग रेत से भरी बोरियां और पत्थर डालकर अस्थायी मार्ग तैयार करते थे। बाद में स्थायी वाहन पुल की मांग को लेकर लंबे समय तक संघर्ष चला और अंतत: नया पुल बनने से आवागमन सुगम हो गया।
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Bगौरव का प्रतीकB
ग्रामीण एस.एम. बापू साहेब के अनुसार, गांव के लोगों की परेशानी दूर करने के उद्देश्य से बना यही झूला पुल डॉ. गिरीश भारद्वाज की उपलब्धियों का पहला कदम साबित हुआ। इसके निर्माण में गांव के अनेक लोगों ने श्रमदान किया था और यह आज भी हमारे गांव के गौरव का प्रतीक है।
Updated on:
22 Jul 2026 06:00 am
Published on:
22 Jul 2026 06:00 am
