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राजस्थान में अब फाइलों में नहीं दबेंगे अदालती आदेश, 8 साल पुरानी पॉलिसी में होगा बदलाव

राजस्थान में मुकदमों का अंबार घटाने के लिए केंद्र सरकार की तर्ज पर पहल की जाएगी। इसके लिए राज्य सरकार आठ साल पुरानी वादकरण नीति को बदलने जा रही है।
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जयपुर

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Anil Prajapat

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शैलेन्द्र अग्रवाल

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Updated: 22 Jul 2026, 6:59 AM IST

Bhajanlal Sharma

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा (फोटो-पत्रिका)

जयपुर। राजस्थान में मुकदमों का अंबार घटाने के लिए केंद्र सरकार की तर्ज पर पहल की जाएगी। इसके लिए राज्य सरकार आठ साल पुरानी वादकरण नीति को बदलने जा रही है। नीति में अदालती फैसलों की पालना के लिए विशेष सेल बनाया जाएगा, वहीं मुकदमों का अंबार घटाने के भी प्रयास किए जाएंगे। नीति का ड्राफ्ट तैयार हो गया है, जिसे विधि मंत्री और महाधिवक्ता की सहमति के बाद राजस्थान मंत्रिमंडल की बैठक में रखा जाएगा।

नीति में सरकार की पैरवी करने वाले वकीलों के वेलफेयर के भी प्रावधान होंगे, ताकि वे बेहतर पैरवी कर सकें। इसके अलावा हाईकोर्ट में केस पंजीयन की व्यवस्था में भी बदलाव होगा। अब तक वर्ष 2018 में वसुंधरा राजे शासन में लाई गई वादकरण नीति प्रभावी है, जो उस समय आनन-फानन में लागू किए जाने के कारण में उसमें कुछ कमजोरियां रह गई थीं।

नई नीति यहां अटक रही

नई नीति में मुकदमों पर निगरानी के लिए विधि अधिकारी के नेतृत्व में अलग सेल बनाने का प्रावधान है, जिस पर वित्तीय भार आने के कारण वित्त विभाग ने आपत्ति भी की।

2018 की नीति में कमजोरियां

  • कई समितियां बना दी गईं, जिससे विवादों के निस्तारण की प्रक्रिया लंबी हो रही है।
  • प्री-लिटिगेशन कमेटी और प्री-अपील कमेटी बनी हुई है। दोनों में ही अतिरिक्त मुख्य सचिव, सचिव की प्रमुख भूमिका।
  • सेवा संबंधी मामलों को प्रमुखता, जिम्मेदारी तय करने को स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं।

मौजूदा नीति में इनका प्रावधान

  • लीगल सेल
  • नोडल ऑफिसर
  • ऑफिसर इन इंचार्ज
  • प्री-लिटिगेशन मॉनिटरिंग कमेटी
  • प्री-अपील मॉनिटरिंग कमेटी
  • राज्य स्तरीय एम्पावर्ड कमेटी

अतिरिक्त चार्ज के भरोसे निगरानी

मुकदमों पर निगरानी के लिए राज्य में अलग से न्याय विभाग है, जिसका पहला प्रमुख सचिव टी श्रीनिवासन काे बनाया था। वे बाद में मुख्य सचिव भी रहे। लेकिन पिछले कुछ सालों से विभाग में संयुक्त सचिव या निचले स्तर के अधिकारी को लगाया जा रहा है, गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को इस विभाग का अतिरिक्त चार्ज दिया जा रहा है। करीब दो दशक पहले यह विभाग विधि विभाग के अधीन होता था, जिसकी निगरानी जिला जज स्तर के अधिकारी के पास रहती थी।

लाइट्स पोर्टल से हुआ था सुधार

श्रीनिवासन के समय सरकार से संबंधित न्यायिक प्रकरणों पर निगरानी के लिए लाइट्स पोर्टल बनाया गया था, जिसके माध्यम से अदालतों में समय पर जवाब एवं अदालती आदेश की पालना की निगरानी की जाती थी। नियमित निगरानी के लिए लगातार मीटिंग भी होती थी। गृह विभाग के कैबिनेट मंत्री के स्तर पर भी समीक्षा होती थी, लेकिन अब लंबे समय से गृह विभाग मुख्यमंत्री के पास रहता है।

यह हो सकता है प्रभावी प्रयास

विशेषज्ञों का मानना है कि मुकदमों की प्रभावी निगरानी के लिए पूर्व में विकसित ‘लाइट्स’ पोर्टल को ई-कोर्ट्स सिस्टम, नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) और सीसीटीएनएस से जोड़ा जाए तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। केंद्र सरकार भी इसी प्रकार की डिजिटल केस मैनेजमेंट व्यवस्था विकसित कर रही है। नई नीति में वैकल्पिक विवाद समाधान, अनावश्यक अपीलों पर रोक और मुकदमेबाजी कम करने के उपायों पर विशेष जोर रहेगा।

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