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अहंकार की आग में झुलसता युद्ध, जीत कहीं भी नहीं

सहयोगियों का प्रश्न इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना बन गया है। नाटो जो कभी अमरीकी नेतृत्व का सबसे बड़ा स्तंभ था, इस संघर्ष में लगभग निष्क्रिय बना हुआ है।

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विनय कौड़ा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार - पश्चिम एशिया की तपती रेत पर जो युद्ध आरंभ हुआ था, उसे क्षणिक विजय का स्वप्न दिखाकर प्रस्तुत किया गया था- एक त्वरित प्रहार, एक निर्णायक परिणाम और फिर विजयी वापसी। लेकिन इतिहास का स्वभाव है कि वह अहंकार को शीघ्र क्षमा नहीं करता। आज वही युद्ध अपने दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका है और उसके साथ ही उजागर हो चुकी है उस सत्ता की नग्न असहायता, जो स्वयं को विश्व का नियंता मानती थी। डॉनल्ड ट्रंप ने जिस युद्ध को शक्ति-प्रदर्शन का मंच समझा था, वह अब उनकी रणनीतिक भूलों का दर्पण बन चुका है। हाल में उन्होंने ईरान के खिलाफ अशिष्ट और भड़काऊ भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा कि 'स्ट्रेट खोलो वरना नरक में रहोगे' और अपने धमकी भरे संदेश में किसी भी प्रकार का कूटनीतिक संयम नहीं दिखाया। यह एक ऐसी जिद का परिणाम है, जिसमें निर्णय विवेक से नहीं, बल्कि अहंकार से उपजे। उन्होंने यह मान लिया कि राष्ट्रों को केवल उनके शीर्ष नेतृत्व को हटाकर तोड़ा जा सकता है और यह कि शासन का पतन ही समाज का पतन होता है। परन्तु यह आकलन उतना ही सतही था, जितना इतिहास के प्रति उनका विश्वास कमजोर।


ईरान, जिसकी राजनीतिक संरचना बहुस्तरीय और सामाजिक आधार गहरा है, किसी एक प्रहार से नहीं टूट सकता था। इसके विपरीत, उस पर किए गए हमलों ने उसके भीतर प्रतिरोध की ऊर्जा को और प्रज्वलित कर दिया। आज स्थिति यह है कि ट्रंप स्वयं अपने ही निर्मित चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। सहयोगियों का प्रश्न इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना बन गया है। नाटो जो कभी अमरीकी नेतृत्व का सबसे बड़ा स्तंभ था, इस संघर्ष में लगभग निष्क्रिय बना हुआ है। यूरोपीय देशों की हिचकिचाहट केवल सामरिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। वे एक ऐसे युद्ध का भार उठाने को तैयार नहीं, जिसका उद्देश्य स्वयं अस्पष्ट है। अमरीका इस युद्ध में नेतृत्व करते हुए भी अकेला खड़ा है और यह अकेलापन उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं का संकेत है। परंतु यदि बाहरी समर्थन का अभाव एक संकट है, तो आंतरिक अव्यवस्था उससे भी अधिक गहरी समस्या बन चुकी है। ट्रंप प्रशासन आज एक समन्वित शासन कम और परस्पर विरोधी शक्तियों का समूह अधिक प्रतीत होता है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने युद्ध के बीच अचानक सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज और कम से कम दो अन्य वरिष्ठ जनरलों को तत्काल सेवा निवृत्त कर दिया, जिससे पेंटागन के शीर्ष नेतृत्व की संरचना पूरी तरह बदल गई। इसी प्रकार कैबिनेट में हलचल भी तेज हो रही है। एटॉर्नी जनरल पैम बांडी को हटाने से व्यापक सत्ता-संरचना पर कयासों का तूफान उठ गया है। इससे पहले ही आतंकवाद विरोधी प्रमुख जो केंट और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने ईरान नीति पर असहमति के चलते इस्तीफा दे दिया था। ट्रंप कुछ और बड़े बदलावों पर भी विचार कर रहे हैं, जिसमें तुलसी गेबार्ड व काश पटेल जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं।

युद्ध से बढ़ते दबाव ने प्रशासन के भीतर अविश्वास और अस्थिरता को और गहरा कर दिया है। विदेश नीति के मोर्चे पर भी स्थिति विरोधाभासी है। एक ओर कूटनीतिक वार्ता की बात की जाती है, दूसरी ओर बमबारी जारी रहती है। खुफिया एजेंसियों के आकलन और राजनीतिक निर्णयों के बीच की दूरी यह संकेत देती है कि सत्ता के भीतर एक प्रकार का असंतुलन उत्पन्न हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संघर्ष एक जटिल द्वंद्व को जन्म दे रहा है। इजरायल और अमरीका के बीच रणनीतिक मतभेद अब स्पष्ट हैं। जहां ट्रंप एक त्वरित निष्कर्ष चाहते हैं, वहीं इजरायल का लक्ष्य दीर्घकालिक और व्यापक है। यह असमानता युद्ध को और लंबा खींच रही है और समाधान को और दूर कर रही है।


होर्मुज जलडमरूमध्य में निरंतर बाधित व्यापार ने इस युद्ध को वैश्विक संकट में बदल दिया है। यह संघर्ष सीमित नहीं रहा। इसका प्रभाव उन देशों तक पहुंच चुका है, जो इस युद्ध का प्रत्यक्ष हिस्सा भी नहीं हैं। ट्रंप के सामने सबसे कठिन प्रश्न यह है कि वे इस युद्ध से बाहर कैसे निकलें। वे न तो इसे निर्णायक रूप से जीत सकते हैं, न ही बिना राजनीतिक नुकसान के छोड़ सकते हैं। यह युद्ध ऐसा बोझ बन गया, जिसे उठाना भी कठिन है और गिराना भी। यह युद्ध किसी विजय की ओर नहीं, बल्कि थकावट की ओर बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया की यह आग विचारों को भी जला रही है। यह उस भ्रम को भस्म कर रही है कि शक्ति ही समाधान है। जब यह धुआं छंटेगा, तब यही सत्य सबसे स्पष्ट होगा कि युद्ध केवल तब जीता जा सकता है, जब उसे समझा जाए और समझ तभी आती है जब अहंकार से ऊपर उठकर विचार किया जाए।