जयपुर। राज्य में जवाबदेही कानून की मांग जोर पकड़ रही है। प्रदेश भर में जवाबदेही यात्रा निकालने के बाद गुरुवार को सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान के समन्वयक निखिल डे कहा कि लोगों को सरकारी योजनाओं का सही तरह से लाभ तभी मिलेगा जब जवाबदेही कानून होगा। उन्होंने कहा कि राजस्थान के 100 से ज्यादा संगठन 2015 से लगातार जवाबदेही कानून की मांग कर रहे हैं। इसको लेकर दो बार बजट घोषणा हो चुकी और रामलुभाया कमेटी भी रिपोर्ट दे चुकी। ऐसे में अब कोई कारण नहीं बचा है, जिस वजह से यह कानून टाला जा सके। प्रेस वार्ता में पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव और शंकर सिंह मौजूद रहे।
इसलिए है कानून की जरूरत
केस-01
काटेड़ा, उदयपुर निवासी फताराम ने सिलकोसिस की जांच के लिए जनवरी, 2021 को आवेदन किया। 25 जनवरी, 2022 को उनके पास मैसेज आया कि आपकी जांच हो गई है और आपको सिलकोसिस नहीं है। जबकि, फताराम की न तो जांच हुई और न ही कभी किसी ने उन्हें जांच के लिए बुलाया।
केस-2
अजमेर निवासी आसिफ की मानें तो उसके पिता इकरामुद्दीन ने वर्ष 2018 में सिलकोसिस की जांच करवाई। प्रमाण पत्र मिलने में दो वर्ष लग गए। ऐसे में इकरामुद्दीन फिर से बीमार हो गए। इलाज के लिए सात लाख रुपए का कर्जा भी ले लिया। तीन सितम्बर को उनकी मौत हो गई। परिवार को कोई पेंशन नहीं मिल रही।
इसी तरह सिरोही के पिंडवाड़ा की लासी देवी और ब्यावर की मंथरा के पति की भी सिलकोसिस मौत हुई है। अब तक इन लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसे में उन अधिकारियों की जवाबदेही तो बनती है, जिन्होंने सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं लेने दिया।
मुख्यमंत्री से की मांग
सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने गुरुवार को एक वीडियो जारी कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से जवाबदेही कानून को विधानसभा में पारित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि हमें पता है कि कैसे आपने चार घंटे में स्वास्थ्य का कानून पारित किया था, लेकिन जब तक आप जवाबदेही कानून पारित नहीं करेंगे, तब तक हमें किसी न किसी तरह से स्वास्थ्य से वंचित किए जाते रहेंगे। क्योंकि किसी भी कर्मचारी की जवाबदेही नहीं होती है। शुक्रवार शाम तक इस कानून को विधानसभा में पारित करने की मांग की।