केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी वन्य जीव प्रेमियों के बीच प्रसिद्ध है। यहां पर हर वर्ष लाखों की संख्या में देश-विदेशी सैलानी पक्षियों की अनोखी दुनिया को देखने पहुंचते हैं।
उद्यान की इसी खासियत को देखते हुए उसे विश्वदाय प्राकृतिक स्थल (वल्र्ड हेरीटेज नेचुरल साइट) का खिताब मिला हुआ है। लेकिन इसके बाद भी जिला प्रशासन इसको लेकर गंभीर नहीं है।
फिलहाल, इस प्राकृतिक स्थल को उसकी ख्याति के अनुसार उसे तबज्जो नहीं मिलने का खामियाजा भविष्य में पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों के साथ भरतपुरवासियों को भी उठाना पड़ सकता है। भरतपुर की पहचान में घना वर्तमान में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
बड़ी संख्या में मिलते हैं पक्षी
उद्यान कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसमें 56 परिवारों की करीब 370 प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। इसमें एक समय साईबेरियन पक्षी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता था लेकिन अफगानिस्तान के गृह युद्ध के कारण उसने यहां से मुंह मोड़ लिया।
साईबेरियन पक्षी अंतिम बार वर्ष 2003 में दिखाई दिया था। इस पक्षी के वापस घना में लाने के प्रयास जारी है। इसके केन्द्र सरकार के स्तर पर एक योजना पर कार्य चल रहा है।
जिला प्रशासन को लिखा पत्र
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के पांच सौ मीटर साईलेंस जोन में हो रहे शोर-शराबे को लेकर जिला प्रशासन को पत्र लिखा है।
केवलादेव निदेशक बीजो जोय ने बताया कि घना के आसपास होनी वाली आतिशबाजी व फ्लैश लाइट मशीन पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन को पत्र लिखा है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उच्चाधिकारियों को भी अवगत कराया है।
यूनेस्को ने दी थी चेतावनी
घना के लिए पानी का स्थाई प्रबंध नहीं होने पर यूनेस्को द्वारा वर्ष 2009 में पहली चेतावनी दी गई थी। इसमें उद्यान को विश्व धरोहर सूची की डेंजर्स लिस्ट में शामिल करने के लिए आगाह किया। चेतावनी पर ध्यान नहीं दिए जाने पर यूनेस्को ने वर्ष 2010 व 2011 में भी चेतावनी पत्र भेजा।
राज्य सरकार ने गंभीरता से लेते हुए धौलपुर-भरतपुर चंबल लिफ्ट परियोजना के कार्य को तेजी से निपटाते हुए घना में गत वर्ष 2010 के अक्टूबर माह में पानी छुड़वाया।
पिछले दो वर्ष से चंबल को पानी मिलने से यूनेस्को ने हाल में संपन्न हुई सदस्यों की बैठक में घना को डेंजर्स लिस्ट सूची शामिल करने की चेतावनी को वापस लिया है, इससे घना से जुड़े लोगों ने राहत की सांस ली।
पहले यहां होता था शिकार
घना भले ही आज पक्षियों के लिए सुरक्षित सैरगाह मानी जाती हो, लेकिन पुराने समय में यह शिकारगाह के रूप में था। यहां पर पहली बार वायसराय लॉर्ड कर्जन के आगमन पर 1 दिसम्बर 1902 को शिकार हुआ।
इसके बाद भारत के वायसराय एवं गर्वनर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो की मौजूदगी में 12 नवम्बर 1938 में पहली बार सर्वाधिक 4 हजार 273 पक्षियों का शिकार हुआ। देश के आजाद होने पर इस स्थल को वर्ड सेंचुरी बना दिया।
इसके बाद 1981 में राष्ट्रीय उद्यान बनाया और नम्बर 1982 में इसका नोटिफिकेशन जारी किया गया।
यूनेस्को ने घना को वर्ष 1985 में विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया था। देश में प्राकृतिक स्थल के रूप में काजीरंगा पार्क के बाद घना दूसरी वल्र्ड हेरीटेज नेचुरल साइट है।