
आज भले ही देश के भीतर धर्म और जाति के नाम पर लोग एक दूसरे से दूरी बनाते दिख रहे हो। बावजूद इसके राजस्थान में एक ऐसा भी जगह है, जहां लोगों के बीच अजान की आवाज और शिवालय की घंटी एक दूसरे को काफी सकून देती है। इतना ही यहां एक ही आंगन में दरगाह और मंदिर भी है। जहां दरगाह में आने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग भी मंदिर में शिवलिंग की पूजा करते हैं। तो वहीं इस खास जगह मंदिर के दरवाजे पर लाइलाह इल्लिाह आदम सफि्युल्लाह लिखा हुआ है। जो अपने आप में साम्प्रादियक सौहार्दय की मिसाल के रुप में है।
दरअसल, राजस्थान के अजमेर में स्थित बाबा बादाम शाह की दरगाह के अंदर ही शिव का मंदिर है। जहां नमाजी भी इस मंदिर में पूजा-अराधना उतनी ही भक्तिभाव से करते हैं, जितनी की नमाज अदा करते समय उनकी आखों में देखी जाती है। तो वहीं इस दरगाह को देश में सूफी उवैसिया सिलसिले की 8वें दरगाह के लिए जाना जाता है। अजमेर के सोमलपुर गांव में स्थित इस दरगाह को बाबा बादाम शाह के खास रहे हजरत हरप्रसाद ने बनवाया था।
सफेद संगमरमर से तैयार यह दरगाह दूर से देखने पर ताजमहल की याद ताजा कर देता है। जबकि यहां आने वाले लोगों के लिए यह जगह पर्यटन स्थल होने के साथ ही आस्था के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण माना माना जाता है। हर जाति और धर्म के लोगों को अपनाने वाले बाबा बादाम शाह ने हमेशा से कौमी एकता को बढ़ावा दिया। यही वजह है कि उनके इस दरगाह पर शिवालय और मस्जिद दोनों एक साथ है। यहां पहाड़ी तलहटी पर स्थित इस पाक मरकज में लोगों की इतनी आस्था है कि बिना किसी धर्म के भेदभाव के लोग एक साथ आरती और अजान करते दिखते हैं।
बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में सन् 1870 को हुआ था। जन्म के 14 साल बाद ही उन्होंने घर छोड़कर सूफीवाद की तरफ अपना ध्यान लगा दिया। जिसके बाद संत प्रेमदास ने उन्हें अपना शिष्य बनाया और शिक्षा-दीक्षा दी। जिसके बाद वो ख्वाजा की दरगाह पर इबादत करने लगें। और इसी दौरान इन्हें मुर्शिद सय्यदना मोहम्मद निजामुलहक मिले। जिसके बाद से बाबा ने लोगों की तकलीफ बिना किसी धर्म और जाति के दूर करने में जुट गए। और यही कारण था कि उनके दरबार में हर धर्म के लोगों का आना जाना होने लगा। तो वहीं बाबा के इस मरकज पर अपनी मन्नत पूरी करने के लिए हर सम्प्रदाय के लोग भारी संख्या में जुटते हैं।
Published on:
02 Oct 2017 08:28 pm

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