
जयपुर ।
देशभर में आज परशुराम जयंती ( Parshuram Jayanti ) मनाई जा रही है। परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं और हर साल अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है। राजस्थान में भी परशुराम भगवान की मान्यता बहुत अधिक है।
राजस्थान के राजसमंद जिले की अरावली पर्वत माला में एक शिव मंदिर है जिसे परशुराम महादेव गुफा मंदिर के नाम से जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार परशुराम महादेव गुफा मंदिर का निर्माण खुद परशुराम ने अपने फरसे से किया था। महान तपस्वी और योद्धा परशुराम धनुर्विद्या के ज्ञाता हैं फरसा उनका प्रिय शस्त्र है।
वहीं, भगवान परशुराम के फरसे की बात आती है तो बताया जाता है कि झारखंड में रांची से करीब 150 किमी की दूरी पर घने जंगलों में स्थित टांगीनाथ धाम के बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान परशुराम का फरसा गड़ा हुआ है। यह इलाका नक्सल प्रभावित है। यहां स्थानीय भाषा में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस जगह का नाम टांगीनाथ धाम हो गया।
इस जगह भगवान परशुराम का फरसा जमीन में गड़ा हुआ है। यहां परशुराम के चरण चिह्न भी बताए जाते हैं। चूंकि परशुराम महान तपस्वी हैं। उन्होंने तप से अद्भुत सिद्धि और शक्तियां प्राप्त की हैं। इस स्थान से एक अद्भुत कथा भी जुड़ी है।
भगवान परशुराम के फरसे से जुडी है ये कथा ( Story of Parshuram Jayanti )
जब सीताजी के स्वयंवर में भगवान श्रीराम ने शिव का धनुष तोड़ दिया था तब परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और स्वयंवर स्थल पर आ गए। उस दौरान श्रीराम शांत रहे लेकिन लक्ष्मण से परशुराम का विवाद होने लगा। बहस के बीच जब परशुराम को यह जानकारी होती है कि श्रीराम स्वयं परमेश्वर के अवतार हैं तो उन्हें इस बात का दुख होता है कि उनके लिए कटु वचन इस्तेमाल किए। स्वयंवर स्थल से परशुराम जंगलों में चले जाते हैं। यहां वे अपना फरसा भूमि में गाड़ देते हैं और भगवान शिव की स्थापना करते हैं। यहां वे तपस्या करने लगते हैं। उसी जगह पर आज टांगीनाथ धाम स्थित है। लोगों का विश्वास है कि परशुरामजी का वही फरसा आज भी यहां गड़ा हुआ है।
फरसा काटने से होने लगी मौत ( History of Lord Parshuram )
यह फरसा यहां हजारों साल से बिना किसी देखभाल के गड़ा हुआ है लेकिन आज तक इस पर जंग नहीं लगा है। लोगों का कहना है कि फरसा भूमि में कितना गड़ा हुआ है, यह कोई नहीं जानता। इसके बारे में एक कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार इस इलाके में लोहार आकर रहने लगे थे।
काम के दौरान उन्हें लोहे की जरूरत हुई तो उन्होंने परशुराम का यह फरसा काटने की कोशिश की। काफी कोशिश के बाद भी वे फरसा नहीं काट पाए, लेकिन इसका नतीजा बहुत बुरा हुआ। उस परिवार के सदस्यों की मौत होने लगी। इसके बाद उन्होंने वह इलाका छोड़ दिया। आज भी टांगीनाथ धाम के आसपास लोहार नहीं रहते। उस घटना का खौफ उनके मन में आज भी ताजा है।
Published on:
07 May 2019 03:30 pm
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