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अपराधियों को बचा रहा है अंग्रेजों के जमाने का आर्म्स एक्ट

आर्म्स एक्ट की एक धारा पुलिस के लिए परेशानी तो बदमाशों को फायदा पहुंचा रही है। आयुध अधिनियम 1959 हथियार तस्करी के बढ़ते मामलों और फायरिंग की घटनाओं में शामिल बदमाशों का मददगार साबित हो रहा है। दरअसल, इस कानून की धारा 39 के तहत जिला कलक्टर से अभियोजन की स्वीकृति लेना आनिवार्य है। इस साल 297 मामले लंबित हैं। एडीजी क्राइम ने गृह विभाग को आर्म्स एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव भी भेजा है।

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आर्म्स एक्ट की एक धारा पुलिस के लिए परेशानी तो बदमाशों को फायदा पहुंचा रही है। आयुध अधिनियम 1959 हथियार तस्करी के बढ़ते मामलों और फायरिंग की घटनाओं में शामिल बदमाशों का मददगार साबित हो रहा है। दरअसल, इस कानून की धारा 39 के तहत जिला कलक्टर से अभियोजन की स्वीकृति लेना आनिवार्य है। इस साल 297 मामले लंबित हैं। एडीजी क्राइम ने गृह विभाग को आर्म्स एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव भी भेजा है।

पूर्व डीजी कपिल गर्ग ने कहा कि हथियारों के बढ़ते मामलों को देखते हुए ब्रिटिश काल के कानून में संशोधन की बहुत जरूरत है। डकैती, हत्या, आतंकी घटनाओं सहित अन्य गंभीर मामलों में पुलिस अफसर अभियोजन की स्वीकृति देते हैं। इसलिए आर्म्स एक्ट में भी पुलिस अफसर को अभियोजन की स्वीकृति देने का प्रावधान होना चाहिए।
तत्कालीन डीजी (सिविल राइट्स व साइबर क्राइम) रवि प्रकाश मेहरड़ा ने संशोधन के लिए प्रस्ताव भेजा था। उनका कहना है कि राज्य सरकार केन्द्र सरकार को अवैध हथियार के आर्म्स एक्ट कानून में संशोधन के लिए प्रस्ताव भेजे। अभी आर्म्स एक्ट के इतने मामले आ रहे हैं कि बार-बार कलक्टर को गवाही के लिए कोर्ट में जाना पड़ता है। कई बार अन्य काम में व्यस्त रहने के कारण कलक्टर समय पर कोर्ट में भी नहीं पहुंच पाते हैं।

पुलिस की ये दलीलें

यह है कानून

1878 में अंग्रेजों के बनाए आर्म्स एक्ट की जगह 1959 में आर्म्स एक्ट लाया गया, लेकिन इसमें अंग्रेजों के बनाए कानून की तर्ज पर कुछ धारा यथावत रख ली। आयुध अधिनियम 1959 की धारा 39 के तहत जिला कलक्टर से अभियोजन की स्वीकृति लेना अनिवार्य है।


जिला मजिस्ट्रेट देते हैं अभियोजन की स्वीकृति

आर्म्स एक्ट के तहत हथियार मिलने पर तस्करों व बदमाशों के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट से अभियोजन की स्वीकृति लेनी होती है। इससे बदमाशों के खिलाफ कार्रवाई में लंबा समय लगता है।