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Article 370 Revoked : हमारे सामने दो अफसरों को गोली मारी, घर जला दिए, पड़ोसी बोला भाग जाओ नहीं तो मारे जाओगे

Article 370 Revoked : कश्मीर को जन्नत से जहन्नुम बनते देखा, अब मिला दिल को सुकून, पन्द्रह साल तक कश्मीर में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में लैब प्रभारी रहे डॉ. रामजीलाल शर्मा और उनकी पत्नी पुष्पा की जुबानी, हम निकले ही थे कि चन्द घंटे बाद सूचना मिली, आपका घर खाक हो चुका है
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जयपुर

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Pushpendra Singh Shekhawat

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Updated: 7 Aug 2019, 7:30 AM IST

jaipur

Article 370 Revoked : हमारे सामने दो अफसरों को गोली मारी, घर जला दिए, पड़ोसी बोला भाग जाओ नहीं तो मारे जाओगे

मुकेश शर्मा / जयपुर। वर्ष 1990 में मार्च की कोई तारीख थी। आतंकियों ने हमारे घर के बाहर क्रॉस का निशान लगा दिया था। देर रात मुस्लिम पड़ोसी हांफता हुआ आया। बोला, डॉक्टर साहब... अगला टारगेट आप हैं, तुरन्त यहां से निकल जाओ। हम जान बचाकर निकले ही थे कि कुछ घंटे बाद सूचना मिली, डॉक्टर साहब... आपका घर राख हो गया, आतंकियों ने उसे जला दिया।

कश्मीर के उस दौर के हालात बताती यह दास्तान है डॉ. रामजीलाल शर्मा और उनके परिवार की। डॉ. शर्मा 1975 से मार्च 1990 यानी 15 साल तक कश्मीर के बारामूला में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में लैब प्रभारी रहे। फिर मार्च 1990 में आतंक के साये ने उन्हें अपने ही घर से बेदखल कर दिया। तब से वह जयपुर में राणी सती नगर में रह रहे हैं। डॉ. शर्मा ने बताया, भला हो उस मुस्लिम पड़ोसी का, जिसने हमें समय रहते बता दिया। तड़के 4 बजे मैं, पत्नी पुष्पा और बच्चे जिन कपड़ों में थे, उन्हीं में दौड़े और कार से निकल गए। थोड़ी सी देर हो जाती... तो हमारा क्या होता, यह सोचकर ही दिल सिहर उठता है। अब भारत सरकार के ताजा कदम से उम्मीद बंधी है कि कश्मीर फिर से जन्नत बन सकेगा।


...तब तक माहौल अच्छा था

डॉ. शर्मा ने बताया कि कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र में फेफड़ों के इंफेक्शन से पशुओं, खासतौर पर भेड़ों की मौत हो रही थी। तब भारत सरकार ने वहां लैब खोलने का निर्णय कर 1975 में बरेली मुख्यालय से मुझे प्रभारी बनाकर भेजा था। भारत सरकार ने 13 हैक्टेयर जमीन लीज पर लेकर लाखों रुपए खर्च किए और लैब बनाई। वहां न्यूक्लियर एनर्जी से इंजेक्शन तैयार कर लगाए तो भेड़ों की जान बचने लगी। तब तक कश्मीरी लोग बहुत अच्छे थे।


अंतर लगा तो सिर्फ धारा 370 का
डॉ. शर्मा ने बताया कि 15 वर्ष कश्मीर में रहा। सबकुछ अच्छा था लेकिन धारा 370 खटकती थी। उपलब्ध सरकारी सुविधाओं ने वहां के लोगों को दो वर्गों में बांट रखा था। तब निम्न वर्ग के लोगों को 40 और उच्च वर्ग के लोगों को 80 पैसे किलो चावल मिलते थे। यही चावल उन लोगों के लिए 3 रुपए किलो था, जो भारत सरकार की ओर से वहां जाकर काम करते थे।


हमारे बच्चे जन्म लें, लेकिन उन्हें नहीं हक

डॉ. शर्मा और उनकी पत्नी पुष्पा ने बताया, कश्मीर छोड़ा तब छोटा बेटा 8 साल का था। उसका जन्म कश्मीर में हुआ। जन्म प्रमाण पत्र तो बन गया लेकिन लाभ कुछ नहीं था। कश्मीरियों में के समय बच्चे का स्टेट सब्जेक्ट सर्टिफिकेट बनाया जाता है। इसमें बच्चे के दोनों हाथों के निशान लिए जाते हैं। यह सर्टिफिकेट कश्मीर की नागरिकता की पहचान होता है। सभी सुविधाएं उससे ही मिलती हैं।


एक-एक कर बना रहे थे निशाना
रामजीलाल और पुष्पा ने बताया कि हमने कश्मीर को जन्नत के रूप में भी देखा, बाद में जहन्नुम बनते भी। ऐसा भी दौर था जब वहां देर रात तक महिलाएं गहने पहनकर बेखौफ घूमती थीं। पर्यटक बेधड़क आ-जा सकते थे। फिर जनवरी 1989 से पाकिस्तान प्रायोजित अलगाववादी सोच पनपने लगी। आतंकी हमले शुरू हो गए। कश्मीरी मुस्लिमों का माइंड वॉश किया जाने लगा। भारत सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों को टारगेट कर उनकी हत्या की जाने लगी। हमारी आंखों के सामने ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर और सीबीआइ ऑफिसर को गोली मारी गई। सीबीआइ अफसर की पत्नी ने कहा कि मुझे भी गोली मार दो लेकिन आतंकी यह कहकर चले गए कि तुम्हें तो इसके लिए रोना है, तुम्हें भी मार दिया तो यहां रोने की आवाज किसकी सुनेंगे। आतंकी हमें भी मारना चाहते थे लेकिन हम बच निकले।


धमकाते थे आतंकी

वर्ष 1990 में हालात ऐसे हो चले थे कि सुबह-शाम लाउड स्पीकर से कहा जाता कि काफिरों को बाहर निकालो, इनकी कोई मदद नहीं करेगा। सब्जी वालों के पास सब्जी तो होती थी लेकिन वह हमें देने से इनकार कर देते थे। हमें कोई सामान नहीं बेचता था। कोई कुछ देता भी तो छुपकर। अलगाववादी और आतंकी स्कूलों में आग लगा देते थे। कई स्कूली बच्चों को हथियार देकर भेजते थे।


पता नहीं बताया तो मकान मालिक को गोली मारी
डॉ. शर्मा और पुष्पा ने बताया कि हम पहले श्रीनगर के करणनगर में रहते थे। सितम्बर 1989 में किराए का मकान बदला तब आतंकी हमें ढंूढ रहे थे। पुराने मकान मालिक पीएन कॉल ने हमारा नया पता नहीं बताया तो आतंकियों ने उनके पैर में गोली मार दी।

जाकर देखा तो सबकुछ जल चुका था
शर्मा दम्पती ने बताया, कश्मीर से भागे तो इंस्टीट्यूट के बरेली स्थित मुख्यालय आ गए। हमारे पास कुछ नहीं था। किसी ने परात दी तो किसी ने चकला-बेलन। संस्था के हीटर पर खाना बनाना पड़ा था। छह माह बाद बीएसएफ के संरक्षण में कश्मीर के करणनगर स्थित अपने मकान पर पहुंचे तो वह खंडहर हो चुका था। वहां कुछ नहीं बचा था। जो बचा था, शायद लोग लूट ले गए थे। कश्मीर छोड़ा तब बेटी शीतल दसवीं, बेटा विवेक नौवीं और छोटा बेटा भास्कर आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। स्कूल के दस्तावेज भी जल गए थे। यहां स्कूलों में दाखिला कराने में बड़ी परेशानी हुई थी।


दुर्भाग्य... सेना के पास अपनी जमीन नहीं

डॉ. शर्मा का कहना है कि देश की सुरक्षा में लगी सेना के पास वहां खुद की जमीन नहीं है। भारत सरकार काफी पैसा खर्च करने के बाद भी वहां लीज पर जमीन लेती है। लैब खोली तब भी कश्मीर सरकार ने इस शर्त पर जमीन लीज पर दी कि लीज खत्म होने पर उस पर बनाया गया ढांचा कश्मीर सरकार का होगा।

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