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भारत की शिक्षा व्यवस्था मर चुकी है: प्रभाकर

प्रसिद्ध चित्रकार प्रभाकर कोल्टे लंबे समय तक कला-शिक्षण से जुड़े रहे हैं लेकिन आर्ट कॉलेजों की जड़ता और कल्पनाहीनता से निराश होते रहे हैं। पिछले कुछ बरसों से वे मुंबई के एक उपनगर में अपने गुरू मूर्धन्य चित्रकार शंकर पलसीकर की स्मृति में एक ऐसे कला-विद्यालय की स्थापना के लिए प्रयासरत हैं। पेश है, हाल ही में प्रभाकर कोल्टे से अभिषेक कश्यप की हुई बातचीत के मुख्य अंश।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था मर चुकी है: प्रभाकर

आप लगातार आर्ट कॉलेजों और उनके पाठ्यक्रम आदि पर सवाल उठाते रहे हैं।

आप देखें, कोई बच्चा कागज लेता है और अपने सहज बोध से चित्र बनाने लगता है। हमारी शिक्षण संस्थाएं उसके इस सहज बोध को खत्म कर के उसे एक बने-बनाए सांचे में ढालने का काम शुरू कर देती हैं, जिसके दुष्परिणाम आज हम देख रहे हैं। हमें यह सांचा तोड़ देना चाहिए या फिर ऐसा सांचा बनाना चाहिए जो व्यावहारिक रूप से निरंतर परिवर्तनशील हो। यानी वह सांचा हर दिन बदलना चाहिए। इससे हैरानी की बात क्या होगी कि 45-50 साल तक शिक्षण संस्थाओं का पाठ्यक्रम नहीं बदलता।

मैं साफ-साफ कहता हूं-भारत की शिक्षा व्यवस्था मर चुकी है और वह अपने ही तरह का मरा हुआ समाज बना रही है। आर्ट कॉलेजों की भी यही दुर्गति है। एक मशीनी प्रक्रिया के तहत डॉक्टर-इंजीनियर तैयार किए जा रहे हैं और आर्टिस्ट भी।
कला और कला-शिक्षण से जुड़े रहने और बहुत कुछ देख चुकने के बाद मेरा सवाल है कि आर्ट कॉलेजों का सिलेबस तो विद्यार्थियों के लिए ही होता है ना, फिर सिलेबस तैयार करने में विद्यार्थियों की राय क्यों नहीं ली जाती? आप जिनके लिए सिलेबस तैयार कर रहे हैं, उनके सोच-विचार, उनकी रूचियों का आपके लिए कोई महत्व नहीं? कितनी सारी संभावनाएं हैं, जो हम अपने बने-बनाए ऐसे खांचे की वजह से खो देते हैं।

आप जो कला-विद्यालय शुरू रहे हैं, इसकी अवधारणा क्या है?
इसके बारे में तो मैं पिछले 22 साल से सोच रहा था लेकिन हाल ही में फैसला किया। आइडिया तैयार है। मैंने सब कुछ लिख कर तैयार कर रखा है कि कैसे क्या करना है। शंकर पलसीकर मेरे गुरू रहे। यह कला संस्थान उन्हीं की स्मृति को समर्पित है-'शंकर पलसीकर चित्रकूट'। मेरा सौभाग्य है कि इसके लिए मुझो आशा के अनुरूप सहयोग-समर्थन मिल रहा है। मेरी कोशिश रहेगी कि यह संस्थान लीक से हट कर चलता रहे। बाकी आर्ट कॉलेजों की जैसी दुर्गति है, वैसी न हो। आज जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट को देख कर मुझो रोना आता है। यही हाल आज कला भवन (विश्व भारती, शांतिनिकेतन) का भी है।

यह कला संस्थान दृश्य कलाओं में गुरू-शिष्य परंपरा शुरू करना चाहता है ?
जी। आप अपने बच्चे को कला के लिए समर्पित कर दो। अगले 10 साल आप मिलने के लिए भी मत आओ। उसे अपने बलबूते पर खड़ा होने दो। फिर देखो, यहां से वो क्या बन कर निकलता है।

आप देखें, हमारे यहां परीक्षा पास कर लोग डॉक्टर-इंजीनियर बनते हैं, कमाल कि आर्टिस्ट भी बन रहे हैं। क्या परीक्षा पास कर लेने से सचमुच योग्यता हासिल हो जाती है? मैं ऐसे डॉक्टरों को जानता हूं और आर्टिस्टों को भी, जिन्होंने कोई परीक्षा पास नहीं की लेकिन जिनके पास कमाल का हुनर है। इसलिए हमारा आदर्श एकलव्य है, जिसे द्रोणाचार्य ने धनुष विद्या सिखाने से मना कर दिया। बावजूद इसके किसी गुरू या स्कूल के बगैर अपनी लगन से उसने हुनर पैदा किया और इतिहास रच दिया।

आज देश भर में कई सारे आर्ट कैंप, आर्ट समिट आदि हो रहे हैं। क्या आपको लगता है, इससे समाज में चाक्षुष साक्षरता (विजुअल लिटरेसी) बढ़ाने में कुछ मदद मिल पा रही है ?
अगर ये ठीक ढंग से आयोजित हों तो कलाकारों और कला प्रेमियों के लिए आर्ट एजुकेशन का जरिया हो सकते हैं। हम जो देखते हैं, जो नहीं देखते, वो सब एजुकेशन का हिस्सा है। सवाल यह है कि यह एजुकेशन कैसी है? अच्छी या बुरी? अधिकांश आर्ट कैंपों, समिट आदि में 'विजन' का अभाव होता है। ऐसे आयोजनों को देखकर लगता है कि सब पिकनिक मनाने, मौज-मस्ती करने आए हैं। ऐसे में जाहिर है, वे आर्ट की बुरी शिक्षा ही देंगे।