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अन्य खनिजों के साथ निकल रहा है बैरिल

भीलवाड़ा जिले के कुछ खनन क्षेत्रों में एक से दस सेमी के बैरिल के क्रिस्टल मिलने का खुलासा हुआ है।

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Abhishek Pareek

Jan 23, 2016

भीलवाड़ा जिले के कुछ खनन क्षेत्रों में एक से दस सेमी के बैरिल के क्रिस्टल मिलने का खुलासा हुआ है। हालांकि इनकी मात्रा बहुत कम होने से फेल्सपार के साथ निकलने वाले इन बैरिल को अलग करने का काम कुछ मजदूर चन्द राशि के फेर में कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ लोग इसे चोरी-छिपे विदेश (चीन) भेज रहे हैं। परमाणु ऊर्जा आयोग, अंतरिक्ष विज्ञान और विकसित देशी मिसाइल टेक्नोलॉजी में बैरिल का उपयोग किया जाता है। बेशकीमती बैरिल की गुपचुप तस्करी होने से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।

इसकी जांच करने के लिए खान एवं भू विज्ञान निदेशालय के भू विज्ञान के अतिरिक्त निदेशक डॉ. एसएस जामरानी ने भीलवाड़ा, अजमेर, जोधपुर के अधीक्षण भू वैज्ञानिक व राजसमन्द के वरिष्ठ भू वैज्ञानिक को जांच करने के आदेश देते हुए सात दिन में रिपोर्ट पेश करने को कहा है। भीलवाड़ा के अधीक्षण भू वैज्ञानिक विनोद कुमार वैष्णव ने भू वैज्ञानिक शाखा व खनिज विभाग की शाखा की संयुक्त टीम बनाकर इसकी जांच करने के निर्देश दिए।

खनिज विभाग के अनुसार भीलवाड़ा तहसील के तितोली, सांगवा तथा भूणास सहित अन्य गांवों के खनन क्षेत्र का निरीक्षण किया। इसी प्रकार जहाजपुर तहसील के देवरा, झामोली व ओडिया खेड़ा के क्वाट्र्स फेल्सपार के खनन पट्टों का निरीक्षण किया। इसमें पेगमाटाइट में क्वाट्र्स व फेल्सपार के साथ बैरिल कहीं-कहीं क्रिस्टल के रूप में पाया गया है। इसकी लम्बाई दस सेंटीमीटर तक पाई गई है।

राजस्थान में नहीं बैरिल का खनन पट्टा
विभाग के अनुसार भीलवाड़ा सहित राजस्थान के किसी भी जिले में बैरिल का कोई खनन पट्टा नहीं है और ना ही इसका कोई खनन किया जा रहा है। जांच के दौरान किसी भी खनन क्षेत्र या अन्य स्थान पर इसका स्टॉक तक नहीं मिला है। हालांकि कुछ पत्थरों के साथ यह मिनरल निकल रहा है, जिसे खनन क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों को कुछ पैसे देकर उससे निकलवाया जा रहा है। यह मिनरल एटोमिक होने से इसका पूर्वेक्षण भी नहीं किया गया है। यह मिनरल केन्द्र सरकार के उपक्रम एटोमिक मिनरल डिविजन के अधीन आता है।

अजमेर में है बैरिल
बैरिल अजमेर जिले के किशनगढ़, रूपनगढ़, केकड़ी के अलावा मालपुरा व टोंक की खदानों में पाया जाता है।

माइका की तरह कर रहे काम
फेल्सपार के साथ निकलने वाली माइका को भी अलग करने के लिए कुछ लोग यह काम मजदूरों से करवाते हैं। मजदूरों को पांच से दस रुपए किलोग्राम के दाम से यह लोग खरीदते हैं, जिसे बाद में ऊंचे दामों में बाजार में बेच दिया जाता है। इसी प्रकार बैरिल को भी दस रुपए किलो ग्राम की दर से खरीदा जाता है जिसे ऊंची दर पर विदेशों में तस्करी के रूप में बेचा जा रहा है।