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Explainer: क्या है ट्रंप का ‘गोल्डन डोम’? जिसके लिए अमेरिका को हर हाल में चाहिए ग्रीनलैंड

क्या राष्ट्रपति ट्रंप का 'गोल्डन डोम' प्रोजेक्ट बिना ग्रीनलैंड के अधूरा है? जानिए अमेरिका के इस हाई-टेक मिसाइल कवच की पूरी सच्चाई और 1951 के उस रक्षा समझौते को, जो ट्रंप की राह में सबसे बड़ी अड़चन बना हुआ है।

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Donald Trump

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Photo - IANS)

ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद पकड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर कहा है कि उन्हें ग्रीनलैंड से कम पर कुछ भी अस्वीकार्य है। इसके लिए उन्होंने अपने गोल्डन डोम प्रोजेक्ट का हवाला दिया है। जिसके बिना ट्रंप का यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सकता है। ऐसे में समझते हैं कि आखिर क्या है यह प्रोजेक्ट और उसके लिए अमरीका का ग्रीनलैंड पर कब्जा क्या सच में आवश्यक है।

शपथ लेते ही क्यों की थी इसकी घोषणा?

डोनाल्ड ट्रंप ने बीते साल जनवरी में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के साथ ही इजरायल के आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम की तर्ज पर गोल्डन डोम प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य पूरे अमेरिका को किसी भी प्रकार के मिसाइल हमले से बचाना है। इसके लिए ट्रंप ने 175 अरब डॉलर आवंटित करने की योजना बनाई है। इसे उनके कार्यकाल में पूरा करने का लक्ष्य था। हालाकि रक्षा विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। उनके अनुसार इस प्रोजेक्ट की लागत 20 वर्षों में एक ट्रिलियन डॉलर तक हो सकती है।

कैसे काम करेगा गोल्डन डोम?

इस प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका पृथ्वी की निचली कक्षा मेंं बड़ी संख्या में इंटरसेप्टर सैटेलाइटों को तैनात करेगा। जब भी अमेरिका की ओर कोई मिसाइल दागी जाएगी तब ये सैटेलाइट अपनी कक्षा को छोड़ इन मिसाइलों से टकरा जाएंगे। यह एक बहुस्तरीय प्रणाली होगी। अगर इंटरसेप्टर सैटेलाइट मिसाइल रोकने में नाकाम होंगे तब दूसरे विकल्पों का उपयोग किया जाएगा।

ग्रीनलैंड ही क्यों चाहिए?

गोल्डन डोम को तैयार करने के लिए अमेरिका को अंतरिक्ष के साथ ही जमीन और समुद्र पर भी अपनी मिसाइल क्षमताओं को बढ़ाना पड़ेगा। अगर कोई इंटरकॉटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल अमेरिका की ओर दागी जाएगी तो वह उत्तरी ध्रुव के ऊपर से जरूर गुजरेगी। इसलिए उस क्षेत्र में राडार और उन मिसाइलों का होना जरूरी है जो इन मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर उन्हें रोकेंगी। हालाकि अभी अमरीका का ग्रीनलैंड में पिटफिक बेस पर राडार सिस्टम सक्रिय है।

तो क्या सिर्फ बहाना है?

रणनीतिक व भू राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका अभी भी जितना चाहे ग्रीनलैंड में अपने संसाधनों को तैनात कर सकता है। वहां अपने परमाणु हथियारोंकी लोकेशन भी बदल सकता है। इसके लिए उसे सिर्फ एक बार डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों को बताना पड़ेगा। साथ ही अगर एशिया से आने वाली मिसाइलों के खतरे के चलते ग्रीनलैंड चाहिए तो इससे बचाव के लिए मिसाइल डिफेंस सिस्टम को ग्रीनलैंड की बजाय उत्तर पूर्वी अमरीका में तैनात करना ज्यादा बेहतर होगा।

ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच मौजूदा समझौते क्या हैं?

अमेरिका और ग्रीनलैंड के सैन्य संबंधों की बुनियाद 1951 का रक्षा समझौता है, जो NATO फ्रेमवर्क के तहत काम करता है। इस संधि के कारण ही अमेरिका को ग्रीनलैंड के उत्तरी हिस्से में अपना रणनीतिक 'पिटुफिक स्पेस बेस' संचालित करने का अधिकार मिला है। हालांकि, यह समझौता अमेरिका को वहां केवल सैन्य मौजूदगी की अनुमति देता है, मालिकाना हक नहीं।

वर्तमान नियमों के मुताबिक, अमेरिका वहां अपनी मिसाइल क्षमताओं में कोई भी बड़ा विस्तार या परमाणु हथियारों की तैनाती बिना डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार की मंजूरी के नहीं कर सकता। डोनाल्ड ट्रंप की 'गोल्डन डोम' परियोजना के लिए वहां बड़े पैमाने पर नए राडार और इंटरसेप्टर स्टेशन बनाने होंगे, और वे नहीं चाहते कि हर कदम पर उन्हें किसी दूसरे देश से अनुमति लेनी पड़े। यही कारण है कि वे मौजूदा समझौतों में संशोधन करने के बजाय पूरे द्वीप पर नियंत्रण चाहते हैं।