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…राजनैतिक परिवारों के लिए स्व. बिशन सिंह शेखावत का जीवन रहा प्रेरणादायक

राजनैतिक परिवारों के लिए स्व. बिशन सिंह शेखावत का जीवन रहा प्रेरणादायक

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जयपुर

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rohit sharma

Oct 22, 2018

bishan

bishan

जयपुर।

आज जहां राजनीति में आगे आने के लिऐ लोग अपने पारिवारिक रिश्तों को तार तार करने में कोई हिचक महसूस नही करते, भारतीय राजनीति में पिता-पुत्र, भाई-भाई, भाई-बहिन व अन्य रिश्तेदारों के अनेक दृष्टान्त हमारे सामने हैं, जब एक दूसरे को नीचा दिखाकर राजनीति में आगे बढने के लिए निम्न स्तर पर जाने में भी लोग परहेज नही करते, ऐसे में राजस्थान की राजनीति में एक ऐसा उदाहरण है जो आज लोगों के लिए प्रेरणा दायक है, राज्य की राजनीति में अब तक सर्वाधिक लोकप्रिय जननेता, राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री व देष के उपराष्ट्रपति स्व. भैरोंसिंह शेखावत के राजनीति की पहली पाठशाला में प्रवेश करने से संबंधित यह उदाहरण जुडा है, जो आज के राजनीतिक परिवारों से जुडे सदस्यों के लिऐ एक प्रेरणादायी उदाहरण है कि कैसे एक छोटे भाई ने अपने बडे भाई को राजनीति में आगे लाने के लिऐ अपने राजनीतिक जीवन को दाव पर लगा दिया।

हाल ही एक जनसभा में इसका रहस्योद्घाटन भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने किया, उन्होने कहा कि वे भैंरोंसिंह शेखावत को नही जानते थे, 1952 के प्रथम आम चुनाव में उनके नाम का सुझाव उन्हे उनके छोटे भाई बिशन सिंह शेखावत द्वारा दिया गया, उनके सुझाव पर उन्होने न जानते हुऐ भी भैरोंसिंह शेखावत को दांतारामगढ विधानसभा क्षेत्र से उनकी पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया।

दरअसल, भैरोंसिंह शेखावत 1952 से पहले पुलिस में कार्य करते थे, किन्ही व्यक्तिगत कारणों से उन्होने पुलिस की नौकरी छोड दी व अपने गांव खाचरियावास में आकर रहने लगे, उन दिनो बिषन सिंह शेखावाटी क्षेत्र के प्रमुख आर.एस.एस के प्रचारक थे, बिशन सिंह की सादगी, ईमानदारी व निर्भिकता विशेष रूप से तत्कालीन जागीरदारों व सामंतों के विरूद्ध उनके द्वारा किए गये संघर्षों से आम जनता के वे लाडले बन चुके थे, विषेष रूप से सीकर, फतेहपुर, लोसल, रामगढ शेखावाटी, दांतारामगढ के आस पास के क्षेत्रों में उनका अत्यधिक सम्मान था, वे उन्ही दिनो राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘ वीर अर्जुन ’ जिसके सम्पादक स्व. अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं थे, के भी स्थानीय संवाददाता का कार्य भी कर रहे थे।

प्रथम आम चुनाव 1952 की घोषणा के बाद जनसंघ ने अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारने पर विचार आरम्भ किया, स्थानीय कार्यकर्ताओं व आम जनता ने बिशन सिंह की लोकप्रियता के चलते उन्हे जनसंघ का उम्मीदवार दातारामगढ से बनाये जाने का मानो अन्तिम निर्णय कर लिया, तत्कालीन राज्य की राजनीति में अपना एक विशेष स्थान रखने वाले ठाकुर मदन सिंह दांता भी बिशन सिंह के व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित थे, व सिर्फ उनके नाम पर ही सहमत थे।

बिशन सिंह शेखावत अपने बडे भाई भैरोंसिंह शेखावत का सम्मान ठीक उसी तरह से करते थे जैसे रामायण में राम एवं लक्ष्मण के संबंधों को चित्रित किया गया है, बडे भाई भैंरोंसिंह के पुलिस की नौकरी छोडकर गांव में उनकी विकसित हो रही एकान्त प्रवृति से वे मन ही मन में अत्यधिक दुखी थे, उनका बडा भाई भैंरोंसिंह किस तरह पुनः सक्रिय हों, यह विचार उनके मन को विचलित किए हुए था।

जयपुर में भी श्री लाल कृष्ण आडवाणी को भी यह जानकारी थी कि बिषन सिंह ही उनके दातारामगढ से पार्टी के प्रभावी उम्मीदवार हो सकते हैं, आखिर बिषन सिंह से जयपुर में आडवाणी ने चर्चा की व उनकी लोकप्रियता व स्थानीय कार्यकर्ताओं की आम राय के आधार पर उन्हे दांतारामगढ से पार्टी का प्रत्याषी बनाये जाने का प्रस्ताव रखा। ’’ आडवाणी जी आप मेरे स्थान पर मेरे बडे भाई भैरोंसिह को पार्टी का प्रत्याशी बना दें’’, बिशन सिंह ने अपनी राय आडवाणी के सामने रखी, आडवाणी को यह सुनकर बडा आश्चर्य हुआ ’’ बिशन सिंह जी मैने आज तक भैंरोंसिंह का नाम नही सुना है, स्थानीय कार्यकर्ता भी उनसे परिचित नही है, यह कैसे सम्भव होगा, बिशन सिंह ने आडवाणी से कहा कि इसकी चिन्ता आप न करें, मेरी लोकप्रियता ही उन्हे पार्टी का दांतारामगढ से पहला पार्टी विधायक बनाये जाने के लिऐ पर्याप्त है, आडवाणी ने इस पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी।

पार्टी का प्रत्याशी बनाये जाने की सूचना स्वयं बिशन सिंह ने अपने बडे भाई भैंरोंसिंह को दी, ’’ दादोभाई थान्है चुनाव लडनो है, पहला आम चुनाव था भैंरोंसिंह भी चुनाव लडने की प्रक्रिया से परिचित नही थे, जब लडने की बात उन्हे सुनाई दी तो उन्होने सोचा छोटे भाई बिशन सिंह की किसी से लडाई हो गई है, ’’ भैंरोंसिंह खडे हुऐ और बिशन सिंह से कहा ’’ चाल कुण से लडणो है, ’’ लडणो कोनी चुनाव लडनो है, चुनाव कांई होवै है, मै कोनी जाणू, बिशन सिंह ने कहा कि अब चुनाव होसी, जनता वोट डालेली और एम.एल.ए. बणसी, मैं काईं भी कोणी जाणू, तू लड, थारो ही नाम दुनिया जाणे है, आखिर भैरोंसिंह पार्टी के प्रत्याषी बने, जनता ने भैरोंसिंह की जगह बिषन सिंह को ही प्रत्याशी समझा, व भैरोंसिंह पहला चुनाव जीते।

आगे चलकर विधानसभा में क्या बोले, कैसे बोलें इसका पूरा प्रशिक्षण भी बिशन सिंह ने ही अपने भाई भैरोंसिंह को दिया।

आगे चलकर बिशन सिंह शेखावत ने राज्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कर्मचारी एवं शिक्षक नेता के रूप में अपनी पहचान कायम की, राज्य के सुदूर गांवों में बैठे पटवारी, ग्रामसेवक, षिक्षक व कर्मचारियों में स्व. बिशन सिंह का इतना सम्मान था कि आम बोलचाल में भैरोंसिंह के बारे में वे कहते है कि अपने माडसाहब बिशन सिंह जी का ही बडा भाई है, बिशन सिंह की इस प्रतिष्ठा का लाभ भैरोंसिंह को अपने सम्पूर्ण राजनैतिक जीवन में मिला।

इस तरह अब तक के राज्य के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता भैरोंसिह शेखावत का राजनैतिक सफर शुरू हुआ, जो राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री व देश के उपराष्ट्रपति तक पहुंचा। आज बिशन सिंह शेखावत जैसे भाई जिसने अपने स्थापित राजनैतिक भविष्य को अपने भाई के लिऐ सहर्ष उत्सर्ग कर दिया, का जीवन इस अवसर पर राजनीति मे आकर प्रसिद्धि पाने के लिऐ ललायित हो रहे राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को यह उदाहरण निष्चित रूप से एक विशिष्ट मार्गदर्शन दे सकता है।

बिशन सिंह शेखावत आगे चलकर राज्य के सर्वाधिक लोकप्रिय कर्मचारी एवं शिक्षक नेता व ख्यातिनाम पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध हुए यहां यह भी उल्लेख करना समीचीन है कि राज्य के 3 बार अपने भाई भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी स्व. बिशन सिंह ने अपना जीवन एक अति साधारण व्यक्ति के रूप में ही जीया, कत्थई रंग के कुर्ते एवं धोत्ती में जयपुर की सडकों एवं धूल भरे ग्रामीण अंचल में चलते हुऐ उन्हे कोई भी व्यक्ति इस रूप में पहचान लेता था कि ये तो माड साहब बिशन सिंह जी हैं, अधिकांश समय जयपुर की विभिन्न जगहों में किराये के मकानों व आखिर में शास्त्री नगर के अपने 125 वर्गगज के मकान में अपना जीवन जीया। जिस समय बिशन सिंह शेखावत का देहांत हुआ तो उनकी बैंक की पासबुक में मात्र 357 रू. शेष थे।

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