4 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सरकारी अस्पताल गरीबों का सहारा, बीमा कंपनी खड़ी कर रहीं मुश्किलें

गरीब परिवारों को निजी अस्पतालों में इलाज का अवसर मुहैया कराने को पिछली सरकार के समय लाई गई भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना अपने मकसद में नाकाम रही है।

2 min read
Google source verification
ayusman bharat

BSBY

शैलेन्द्र अग्रवाल

जयपुर। गरीब परिवारों को निजी अस्पतालों में इलाज का अवसर मुहैया कराने को पिछली सरकार के समय लाई गई भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना ( Bhamashah Swasthya Bima Yojana ) अपने मकसद में नाकाम रही है। इसके 92 प्रतिशत लाभार्थियों ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराया और निजी अस्पताल में इलाज कराने वालों को सरकारी अस्पताल की सेवाएं ज्यादा अच्छी लगीं। वहीं, 42 प्रतिशत सरकारी अस्पतालों ने शिकायत की है कि बीमा कंपनियां भुगतान देरी से कर रही हैं।

योजना में शामिल परिवारों का भी बीमा कंपनी के साथ अच्छा अनुभव नहीं है। पिछली सरकार के समय कांग्रेस शासन में शुरू मुफ्त दवा योजना पर सवाल उठाए गए और इसके विकल्प के रूप में भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की गई। अब भाजपा सरकार ( raje govt ) के समय की भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन सवालों के बीच राज्य सरकार के मूल्यांकन संगठन निदेशालय ने भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के माध्यम से सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले लाभार्थियों का अध्ययन किया।

यह योजना 13 दिसम्बर 15 को लागू की गई और इसमें प्रतिवर्ष 30 हजार से लेकर तीन लाख रुपए तक के स्वास्थ्य बीमा कवर का प्रावधान है। मूल्यांकन निदेशालय ने 13 दिसम्बर,15 से 12 दिसम्बर,17 के बीच सरकारी अस्पतालों में आए रोगियों की सूचना के आधार पर अध्ययन किया। इसमें सामने आया कि सरकारी अस्पतालों में 30 लाख 19 हजार 705 व्यक्तियों ने इलाज कराया, जिनमें से 13 प्रतिशत भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल थे। लाभार्थियों में सर्वाधिक 52 प्रतिशत लोग 41 वर्ष या अधिक आयु वाले थे। 20 वर्ष से कम आयु वर्ग वाले 16 प्रतिशत ही इलाज कराने आए।

कम पढ़े लोगों को अधिक लाभ:

योजना का सर्वाधिक 45 प्रतिशत लाभ उन लोगों ने लिया, जो कि निरक्षर थे। इस योजना का लाभ लेने वाले 32 प्रतिशत लोग प्राथमिक या उच्च प्राथमिक स्तर तक ही पढ़े हुए थे। 64 प्रतिशत परिवार ऐसे थे, जिन्होंने इस योजना का साल में एक बार ही लाभ लिया।

ये आ रही हैं समस्याएं
- इलाज के लिए लाभार्र्थी कार्ड साथ नहीं ला पाते
- 66 प्रतिशत अस्पतालों में सॉफ्टवेयर की समस्या
- पहचान के लिए डॉक्टर के प्रमाण पत्र को बीमा कंपनी नहीं मानती
- बीमा कंपनी अनावश्यक सवाल-जवाब करती हैं
- तीन-तीन बार फिंगर प्रिंट के बावजूद बायोमेट्रिक डिवाइस पहचानती नहीं
- 47 प्रतिशत राजकीय अस्पतालों को बीमा कंपनी ने देरी से भुगतान किया
- 37 प्रतिशत सरकारी अस्पतालों के अनुसार टोल फ्री नम्बर को लेकर समस्या है।

अब इलाज महंगा नहीं
भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के कारण लाभार्थी परिवारों के बीमारियों पर होने वाले खर्च में कमी आई है। भरतपुर संभाग में मेडिकल कॉलेज नहीं होने के कारण इस योजना के तहत इलाज कराने वालों की संख्या भी कम ही है। इस अध्ययन के अनुसार योजना लागू से पहले 53 प्रतिशत लाभार्थी परिवारों का स्वास्थ्य पर खर्च 4 हजार रुपए या उससे अधिक था। 79 प्रतिशत परिवारों ने यह भी बताया कि इस योजना के बाद उनको कर्ज कम लेना पड़ा।

ओबीसी ने लिया अधिक लाभ
अध्ययन के अनुसार लाभार्थियों में सर्वाधिक 58 प्रतिशत ओबीसी व एसबीसी तथा सबसे कम 6 प्रतिशत एसटी वर्ग से थे। 37 प्रतिशत बीपीएल, 11 प्रतिशत अन्त्योदय योजना परिवार और 3 प्रतिशत निर्माण श्रमिक थे। शेष 49 प्रतिशत अन्य वर्गों से थे। इनमें से 52 प्रतिशत की आय 50 हजार से एक लाख रुपए और 48 प्रतिशत की आय 50 हजार रुपए प्रतिवर्ष से कम थी।

ऐसे सुधारें योजना
- डिस्चार्ज टिकट पर इलाज खर्च के साथ बाकी राशि का भी उल्लेख किया जाए

- भुगतान में देरी पर बीमा कंपनी पर ब्याज लगाया जाए

- प्रभावी मॉनिटरिंग की व्यवस्था की जाए

Story Loader