29 जुलाई 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

लीड : बांध पर किसी भी तरह की मंजूरी विधिसम्मत हो : सीएम विजय

जयपुर

image

Newsdesk

Jul 29, 2026

Rajasthan

चेन्नई. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्यसभा में मेकेडाटू बांध परियोजना को लेकर केंद्र सरकार द्वारा दिए गए हालिया बयान को वापस लेने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया है कि केंद्र सरकार का यह रुख अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों को नियंत्रित करने वाले स्थापित कानूनी सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी करता है।

प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में मुख्यमंत्री विजय ने जल शक्ति राज्य मंत्री के उस बयान पर कड़ा एतराज जताया, जिसमें कहा गया था कि उच्चतम न्यायालय के 16 फरवरी 2018 के फैसले में कर्नाटक के लिए कावेरी नदी पर कोई भी संरचना बनाने से पहले निचले तटीय राज्यों की सहमति लेना स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र का यह जवाब मौजूदा कानूनी स्थिति और निचले राज्यों के अधिकारों के स्थापित सिद्धांतों को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करता है।

कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के बीच हुए मशहूर अलमट्टी मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि अंतर-राज्यीय नदियों पर कोई भी ऐसी परियोजना शुरू करने से पहले निचले तटीय राज्यों की सहमति अनिवार्य है जो उनके हितों को प्रभावित कर सकती हो।

न्यायिक निर्णयों का उल्लेख
उन्होंने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) के फैसले और उसे बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश का भी जिक्र किया। उन्होंने दलील दी कि कावेरी के विनियमित प्रवाह को बदलने की क्षमता रखने वाली किसी भी परियोजना की न्यायाधिकरण के निर्देशों के अनुरूप समीक्षा की जानी चाहिए।

मुख्यमंत्री विजय ने ध्यान दिलाया कि न्यायाधिकरण ने इससे पहले केरल की पामबार पनबिजली परियोजना के लिए भी समन्वित रूप से पानी छोड़ने पर जोर दिया था, जिससे साफ होता है कि निचले राज्यों के हितों की रक्षा करना कितना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधिकरण का फैसला ऊपरी तटीय राज्यों को आपसी सहमति और नियामक प्राधिकरण के परामर्श के बिना तय कार्यक्रम के अनुसार पानी छोड़े जाने की व्यवस्था को प्रभावित करने से रोकता है। इसके अलावा, कर्नाटक द्वारा 2019 में सौंपी गई मेकेडाटू परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को भी केंद्रीय जल आयोग ने न्यायाधिकरण के आदेशों और दिशानिर्देशों के अनुपालन के लिए ही संशोधित करने के लिए वापस भेजा था।

कावेरी नदी पर तमिलनाडु के अधिकारों की रक्षा करने की अपील करते हुए मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि जब तक मेकेडाटू परियोजना पूरी तरह से न्यायाधिकरण के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप साबित न हो जाए, तब तक इसे कोई भी वैधानिक या प्रशासनिक मंजूरी न दी जाए। उन्होंने पानी के आवंटन और विनियमित प्रवाह दोनों के संबंध में निचले राज्यों के अधिकारों को सुनिश्चित करने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने कावेरी को दक्षिण भारत के करोड़ों किसानों और नागरिकों की जीवन रेखा बताते हुए कहा कि न्याय, सहकारी संघवाद और न्यायिक फैसलों के वफादारी से क्रियान्वयन के लिए न्यायाधिकरण के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अखंडता को बनाए रखना बेहद जरूरी है।

Bराजनीतिक दलों ने भी जताई आपत्तिB
केंद्र सरकार के जवाब का तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने कड़ा विरोध जताया है। भाजपा से अलग होकर जनांदोलन शुरू कर चुके वी द लीडर्स के संस्थापक के. अन्नामलै ने केंद्र सरकार के बदले रुख पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कर्नाटक में चुनाव के राजनीतिक लाभ को देखते हुए ऐसा कहा जा रहा है लेकिन तमिलनाडु की जनता को कमतर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।


-

बॉक्स

Bबांध निर्माण के लिए तमिलनाडु की सहमति की आवश्यकता नहींB

नई दिल्ली. मेकेडाटू में कावेरी नदी पर बांध मामले में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर जलाशय बनाने के लिए तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी की सहमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।
केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने सोमवार को राज्यसभा में तमिलनाडु के राज्यसभा सदस्य डॉ. अन्बुमणि रामदास द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि 16 फरवरी 2018 को कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना का निर्माण करने के लिए अन्य तटीय राज्यों तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी से सहमति प्राप्त करना अनिवार्य है।