
सड़क पर बैठकर झाड़ू लगान,खिलौने बनाने और अन्य कार्यों में परिजन का हाथ बंटाने वाले बच्चों को लिखते-पढ़ते देख शायद आप चौंकेंगे। चार-पांच माह पहले तक पढ़ाई का 'ककहरा Ó भी नहीं जानने वाले बच्चों का जीवन धीरे-धीरे बदल रहा है। इन्हें तराशने का बीड़ा राजकीय महिला इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्राओं ने उठाया है।
सरकार शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत गरीब बच्चों को पढ़ाने की एवज में स्कूलों को पुनर्भरण राशि दे रही है, वहीं छात्राएं बगैर पारिश्रमिक बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने में जुटी है।
यूं ही घूमते देखकर आया विचार
बी.टेक कर चुकी छात्रा महक विजयवर्गीय ने बताया कि कॉलेज के निकट झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को यूं ही घूमता देखकर उन्हें काफी पीड़ा होती थी। एक गैर सरकारी संगठन और कॉलेज से बातचीच के बाद उन्होंने पिछले साल कुछ छात्राओं का समूह बनाया। समूह ने बच्चों के माता-पिता से बातचीत कर उन्हें पढ़ाई की महत्ता समझाई। इसके बाद कॉलेज परिसर में टी-101 कमरे में अपराह्न 4 से शाम 6 बजे तक बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
राह नहीं थी आसान
महक ने बताया कि बच्चों को बिल्कुल पढऩा-लिखना नहीं आता था। स्वास्थ्य और दैनिक कार्यों की उन्हें जानकारी नहीं थी। बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी के अक्षरों को लिखने, उच्चारण का अभ्यास कराने में उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी। इस कार्य में जूनियर छात्राओं ने उनकी बहुत मदद की।
दिख रहा बदलाव चारपांच महीने पहले तक किताबों से अनजान बच्चों में धीरे-धीरे बदलाव दिख रहा है। ज्यादातर बच्चे आत्मविश्वास से अंग्रेजी और हिंदी के अक्षर लिखना और बोलना सीख गए हैं। उन्हें रोजाना स्नान, दंत मंजन-पेस्ट, कपड़ों को सलीके से पहनने का तरीका भी बताया जा रहा है। बच्चों के लिए किताबों की व्यवस्था छात्राएं खुद करती हैं।
...ताकि जाएं नियमित स्कूल
इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्राएं चाहती हैं कि यह बच्चे प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त कर नियमित स्कूल जाएं। दो-तीन बच्चों ने स्कूल में प्रवेश लिए भी हैं। उनका मकसद है कि झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाली सभी बच्चों का स्कूलों में प्रवेश हो। छात्राएं बच्चों के अभिभावकों को सरकारी स्कूलों में मिड-डे-मील, नि:शुल्क पुस्तक, छात्राओं को साइकिल, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं की जानकारी भी देती है।
Published on:
03 Jul 2015 12:13 pm
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