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चने की फसल को निगल रहा उखटा, पीला पड़कर सूख रहा पौधा, चिंता में किसान

किसानों का कहना है कि अभी रोग की शुरुआत हुई है। यह अधिक फैल सकता है। ऐसे में इसका समय पर इलाज जरूरी है।

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जयपुर

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Amit Purohit

Mar 01, 2023

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बालघाट (करौली)/पत्रिका न्यूज नेटवर्क. क्षेत्र में चने की फसल में उखटा रोग के लक्षण नजर आ रहे हैं। जानकार बताते हैं कि इसका उपचार नहीं है। शुरुआत में जिन्होंने बीज का उपचार कर बुवाई की वहीं फसल इस रोग की चपेट में आने से बच सकती है। तहसील में 20 हजार हैक्टेयर क्षेत्र से अधिक में चने की पैदावार है। विशेषज्ञों के अनुसार खेती में मिट्टी की संरचना के हिसाब से पौधे को पूरे प्राकृतिक तत्व, पोषक व खनिज नहीं मिल पाने के कारण चने की फसल सूख रही है। ऐसे में चने में किसानों को उखटा (उकठा) रोग का प्रकोप झेलना पड़ सकता है। इसके लक्षण भी नजर आने लगे हैं। अभी सर्द-गर्म का असर भी फसल को प्रभावित कर रहा है।

किसानों ने बताया कि बालघाट, नांगल पहाड़ी, मोरड़ा, कमालपुरा, धवान गांव में चने की फसल में रोग दिख रहा है। किसान नेता शिवदयाल मीणा, प्रहलाद सिंह आदि ने बताया कि महंगे दामों पर बीच खरीदकर चने की बुवाई की थी। इसके साथ ही इसमें कई तरह की दवाओं का छिड़काव किया। काफी मेहनत के बाद भी फसल में रोग लग गया।

किसानों का कहना है कि अभी रोग की शुरुआत हुई है। यह अधिक फैल सकता है। ऐसे में इसका समय पर इलाज जरूरी है। इस रोग में पहले पत्ती पीली पड़ती है फिर पौधा सूख रहा है। चने के पौधे को मिट्टी से उखाड़ कर देखने से इसमें गांठे नजर आ रही है। इसे ही उखटा का शुरुआती लक्षण माना जाता है। इससे पहले पौधे के पत्ते पीले पडऩे लगते हैं। इसके बाद 4-6 दिन बाद पेड़ सूखकर नष्ट हो रहा है।

तापमान में उतार-चढ़ाव का असर:
कृषि पर्यवेक्षक कैलाश बैरवा ने बताया कि इस समय मौसम में उतार चढ़ाव चल रहा है। दिन में तेज धूप और रात को हल्की सर्दी का असर है। दिन की तेज धूप के दौरान सिंचाई करने से चने में उखटा रोग को फैलने में आसानी होती है। इसलिए अधिक सिंचाई नहीं करे। उन्होंने बताया कि चने की बुवाई करने से पहले बीजोपचार कराना जरूरी है। गर्मी में खेतों की गहरी जुताई किए जाने से उखटा को रोका जा सकता है। लगातार एक ही खेत में चने की बुवाई करने से भी बचें।

यह करें बचाव का उपाय:
इस रोग से बचने के लिए हेक्सआकॉनाजोल दवा का चने की बुवाई के समय ही छिड़काव जरूरी है। इसके अलावा ट्राइकोड्रर्मा पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। चार किलोग्राम ट्राइकोड्रर्माको 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर बुवाई से पहले प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाना जरूरी है। खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर कॉर्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी 0.2 प्रतिशत घोल का पौधों के जड़ क्षेत्र में छिड़काव करें।

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