
रमजान के महीने की अहमियत बता रहे हैं मुफ्ती जाकिर नोमानी
जयपुर.रमजान के महीने में रोजे रख मुस्लिम सब्र का इम्तिहान देते हैं। पत्रिका ने इस महीने की अहमियत पर बात की शहर मुफ्ती मोहम्मद जाकिर नोमानी से। उन्होंने कहा, मिसाल मशहूर है कि कर्ज, फर्ज और मर्ज को हल्का नहीं समझाना चाहिए। जिन लोगों के जिम्मे रमजान के फर्ज रोजे छूटे हुए (कजा) हों या नजर मन्नत माने हुए रोजे हों या कोई नफ्ल रोजा रखकर तोड़ दिया गया हो इन रोजो की कजा रखना लाजमी है। ये चीजे सिर्फ तौबा, दुआ कर लेने से माफ नहीं होती और नफ्ल रोजे रखने के बजाए जरूरी रोजे रखकर जिम्मेदारी से बाहर आना चाहिए। हदीस में है कि जिस ने रमजान के रोजे रखे और उसके बाद छह नफ्ल रोजे शव्वाल (ईद) के महीने में रख लिए तो पूरे साल के रोजे रखने का सवाब है। अगर ऐसा करेगा तो मानो इस ने सारी उम्र के रोजे रखे। यह छह रोजे माहे शव्वाल (ईद) में कभी भी रख सकते हैं, लगातार भी और फासलों से भी।
रोजा इफ्तार और सहरी का वक्त
मुताबिक इफ्तार सहरी
शुक्रवार शनिवार
मुफ्ती—ए—शहर 7.12 4.07
जामा मस्जिद 7.14 3.57
दारुल—उलूम रजविया 7.11 4.04
शिया इस्ना अशरी 7.26 3.57
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Published on:
21 May 2020 05:59 pm
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