जयपुर

फ्लॉप हो गया एबीसी…एनजीओ को करोड़ों का भुगतान, फिर भी बधियाकरण प्रोग्राम फेल

-1512 रुपए प्रति श्वान बधियाकरण का भुगतान किया जा रहा एनजीओ को -10 वर्ष में भी सीमित नहीं कर पाए श्वानों की संख्या -स्टाफ की कमी नहीं, फिर भी काम एनजीओ के भरोसे

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Oct 27, 2022
फ्लॉप हो गया एबीसी...एनजीओ को करोड़ों का भुगतान, फिर भी बधियाकरण प्रोग्राम फेल

जयपुर. शहर में श्वानों की संख्या सीमित करने के नाम पर हर वर्ष लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन निगरानी तंत्र न होने से कोई फायदा नजर नहीं आ रहा। पिछले 10 वर्ष से शहर में एंटी बर्थ कंट्रोल (एबीसी) प्रोग्राम चल रहा है, इसके बावजूद श्वानों की संख्या सीमित नहीं हो पाई। निगम ने इसके लिए एनजीओ को जोड़ा और एनजीओ को अब तक करोड़ों का भुगतान किया जा चुका है।

हैरानी की बात यह है कि एनजीओ कैसे काम कर रहा है, इसकी निगरानी निगम की ओर से नहीं की जाती। जब डॉग बाइट के मामले ज्यादा होते हैं तो निगम फर्म को ब्लैकलिस्ट कर अपने हाथ साफ कर लेता है।

जबकि, नगर निगमों की पशु प्रबंधन शाखा में दो-दो चिकित्सक और तीन पशु धन सहायक तैनात हैं। पशु पालन विभाग से कुछ चिकित्सक तो पोस्ट न होने के बाद भी निगम में डटे हैं।

हैरिटेज नगर निगम प्रति श्वान 1512 रुपए एबीसी प्रोग्राम के तहत एक एनजीओ को दे रहा है। वहीं, ग्रेटर नगर निगम में पिछले आठ माह से श्वानों का बधियाकरण बंद है।

80 हजार में से आधों का ही बधियाकरण

अनुमान के मुताबिक शहर में श्वानों की संख्या 80 हजार के आस-पास है। अब तक एबीसी प्रोग्राम के तहत 40 हजार श्वानों के बधियाकरण का दावा निगम की ओर से किया जाता है। जिस श्वान का बधियाकरण हो जाता है, उसके दाएं कान को थोड़ा सा काट देते हैं।

निगम गंभीर नहीं

ग्रेटर नगर निगम: आवारा श्वानों को एंटी रैबीज वैक्सीन लगाने वाली और बधियाकरण करने वाली फर्म ने बकाया का भुगतान न होने से काम बंद कर दिया।

हैरिटेज निगम: पिछले कई माह से एबीसी प्रोग्राम बंद था। एक सितम्बर से इसे चालू किया गया। हालांकि, प्रति श्वान दर 1512 रुपए निर्धारित की है। पहले इसे 819 रुपए में किया जाता था।

प्रोग्राम को नियमित चलाने की जरूरत

एबीसी प्रोग्राम को लगातार चलाने की जरूरत है। इसको बीच में रोका जाएगा तो कोई फायदा नहीं होगा। ग्रेटर निगम में श्वानों के काटने की शिकायतें बढ़ रही हैं, लेकिन उसके बाद भी निगम ने प्रोग्राम बंद कर रखा है। इसको चलाने की जरूरत है।

-मरियम अबू हैदरी, एनिमल एक्टिविस्ट

सवाल: शहर में श्वानों के बधियाकरण के लिए नगर निगम के पास कितनी बड़ी टीम है? क्या यह टीम पर्याप्त है?

जवाब: हैरिटेज नगर में एनजीओ ने दो टीमें लगा रखी हैं। इन दो टीम में छह लोग हैं। एनजीओ के संसाधन कम हैं। निगम के पास दो चिकित्सक हैं। लेकिन इनके पास बधियाकरण से संबंधित कोई काम नहीं है।

सवाल: क्या यह काम आउटसोर्स पर दे रखा है?

जवाब: हैरिटेेज निगम ने काम एक एनजीओ को दे रखा है और ग्रेटर में एबीसी प्रोग्राम ही बंद है।

सवाल: एनजीओ अपना काम सही ढंग से कर रहा है या नहीं और इसकी जांच कब-कब की गई?

जवाब: एनजीओ सही तरह से काम नहीं कर रहा है। निगम ने इसको जांचने की जरूरत ही नहीं समझी। कई बार एनजीओ बिना बताए ही काम बंद कर देते हैं।

सवाल: उसको कितना भुगतान किया जाता है?

जवाब: हैरिटेज नगर निगम 1512 रुपए प्रति श्वान का भुगतान कर रहा है। अब तक चार करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया जा चुका है।

सवाल: शहर में श्वानों की कितनी संख्या है? इनमे से कितनों का बधियाकरण हो चुका है?

जवाब: अनुमानतः 80 हजार श्वान शहर में हैं। इनमें से करीब 40 हजार का बधियाकरण हो चुका है।

सवाल: कैसे पहचाना जाता है की कौन से श्वान का बाधियाकरण हो चुका है और किसका करना है?

जवाब: बधियाकरण के बाद श्वान के कान को काट दिया जाता है। जिस श्वान का कान कटा नहीं होता, उसका बधियाकरण किया जाता है।

Published on:
27 Oct 2022 12:22 pm
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