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संपादकीय: तकनीक के इस्तेमाल में संवेदनाओं का भी महत्व

चिंता यह भी की जानी चाहिए कि यदि वास्तविक संबंधों के बजाय लोगों को इसी तरह डिजिटल दुनिया के सहारे भ्रम में रखा जाने लगा तो सामाजिक रिश्तों की प्रकृति बदलते भी देर नहीं लगने वाली।

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इस दुनिया में जो आया है उसे एक न एक दिन जाना ही होगा, यह अटल सत्य है। यह भी एक तथ्य है कि प्रकृति ने इंसान को बड़े से बड़े आघात को समय के साथ भुला देने की क्षमता भी प्रदान की है ताकि जीवन पटरी पर आ सके। चीन में अस्सी वर्षीया मां को बेटे की मौत की खबर से दूर रख एआइ की मदद से बेटे का वर्चुअल रूप तैयार कर रोजाना संवाद कराने की खबर है। इसे भले ही तकनीक का अनूठा इस्तेमाल कहा जा रहा हो, पर इससे जुड़े कई ऐसे सवाल भी है जिनका जवाब तलाशना जरूरी हो जाता है।

सबसे बड़ा सवाल तो नैतिकता का है। साथ ही यह भी कि मां को अपने बेटे के न रहने की जब किसी माध्यम से जानकारी मिलेगी तो क्या इसे भावनाओं से खिलवाड़ नहीं माना जाएगा कि एक मां को उसके बेटे के जिंदा होने की झूठी दिलासा दी जाती रही है। दूसरा सवाल यह भी कि इस तरह के वर्चुअल इंसान के जरिये आपराधिक वारदातों का नया खतरा सामने आने लगा तो हमारे पास उससे निपटने की कौनसी राह होगी? यह सच कि अपने प्रियजन के न रहने की खबर का आघात असहनीय होता है। प्रियजन की मौत का आघात अचानक नहीं पहुंचे इसलिए इसे एक थैरेपी का रूप माना जा सका है। लेकिन तथ्य यह भी है कि किसी को बुरी खबर कब और कैसे सुनाई जाए इसका खास ध्यान रखा जाता रहा है। मौत के बाद भी किसी को आभासी रूप से जिंदा रखना अलग बात है लेकिन ममता से खिलवाड़ करना दूसरी बात। मां को दिलासा दिलाने के इस प्रयोग के पक्षधर भी होंगे तो विरोधी भी कम नहीं होंगे। जो पक्षधर हैं वे यह कह सकते हैं कि एआइ क्लोन की तकनीक व्यक्ति की यादों को जीवित रखने का नया माध्यम भी बन सकती है। ऐसा इसलिए भी कि फोटो, वीडियो और आवाज के डेटा के आधार पर बनाए गए ये एआइ अवतार किसी के भी व्यक्तित्व और बोलचाल की शैली में काफी हद तक हूबहू लगते हैं। चिंता यह भी की जानी चाहिए कि यदि वास्तविक संबंधों के बजाय लोगों को इसी तरह डिजिटल दुनिया के सहारे भ्रम में रखा जाने लगा तो सामाजिक रिश्तों की प्रकृति बदलते भी देर नहीं लगने वाली। यह भी बहस का विषय हो सकता है कि मृत व्यक्ति के डेटा का उपयोग कर उसका डिजिटल रूप बनाना उचित है या नहीं। इस तकनीक के वे खतरे भी सामने कम नहीं है, जो आपराधिक वारदातों को जन्म देने वाले हो सकते हैं।

एआइ के जरिये मृत व्यक्ति का क्लोन बनाना तकनीक का चमत्कार भले ही कहा जा रहा हो लेकिन यह संवेदनशील मसला है। ऐसी तकनीक यह जहां एक वज्रपात से लगने वाली खबर सहन नहीं कर सकने वाले लोगों को सहारा दे सकती है, लेकिन दूसरी ओर यह मानसिक, नैतिक और सामाजिक चुनौतियां भी पैदा करती है। इसलिए इस तरह की तकनीक का उपयोग सावधानी, स्पष्ट नियमों और नैतिक दिशा-निर्देशों के साथ ही किया जाना चाहिए, ताकि यह मानवता के हित में संतुलित रूप से काम कर सके।