11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संपादकीय: योजनाओं का पैसा रोककर विकास की उम्मीद बेमानी

कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, हर फाइल 'अनुमोदन' की अंतहीन यात्रा में भटकती रहती है।

2 min read
Google source verification

देश के विकास की गाड़ी योजनाओं की पटरियों पर दौड़ती है। जब ये पटरियां ही जंग खा जाएं, तो रफ्तार थमना स्वाभाविक है। केंद्र सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए राज्यों को भेजे गए 43 हजार करोड़ रुपए का खर्च न हो पाना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवेदनहीनता, शिथिलता और जवाबदेही के अभाव का खतरनाक संकेत है। यह वह धनराशि है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और जल जीवन मिशन जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव आता। लेकिन नेताओं व अफसरों की अकर्मण्यता ने इन उम्मीदों को कागजों में ही कैद कर दिया।

समग्र शिक्षा योजना के 6730 करोड़, सक्षम आंगनवाड़ी व पोषण 2.0 के 6352 करोड़ और जल जीवन मिशन के 5371 करोड़ रुपए- ये केवल आंकड़े नहीं हैं, इनके पीछे करोड़ों बच्चों की बेहतर शिक्षा, लाखों माताओं व शिशुओं का पोषण और करोड़ों घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का सपना जुड़ा है। इस वित्त वर्ष में दिसंबर तक यह राशि खर्च न हो पाना यह बताता है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अब भी योजनाओं को जमीन पर नहीं उतार पा रही है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब राज्यों को केंद्र से धन मिल चुका था, तो फिर खर्च क्यों नहीं हुआ? क्या योजनाओं की स्वीकृति में अनावश्यक देरी हुई? क्या टेंडर प्रक्रिया जानबूझकर उलझाई गई? या फिर विभागीय समन्वय की कमी ने काम रोक दिया? जो भी कारण हों, अंतत: नुकसान आम जनता का हुआ है। गांवों में अधूरे स्कूल भवन, जर्जर आंगनवाड़ी केंद्र, सूखे नल और कुपोषण से जूझते बच्चे- ये सब उसी लापरवाही का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। फाइलों में उलझी योजनाएं और निर्णय लेने से बचने की प्रवृत्ति अब एक गंभीर रोग बन चुकी है। कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, हर फाइल 'अनुमोदन' की अंतहीन यात्रा में भटकती रहती है। परिणामस्वरूप समय सीमा निकल जाती है और बजट लैप्स हो जाता है। यह केवल धन की बर्बादी नहीं, बल्कि विकास के अवसरों की हत्या है। विडंबना यह है कि एक ओर सरकारें संसाधनों की कमी का रोना रोती हैं, दूसरी ओर उपलब्ध धन भी खर्च नहीं कर पातीं। 43 हजार करोड़ रुपए का समय पर उपयोग न हो पाना सामाजिक न्याय और समान विकास की अवधारणा पर भी आघात है।

अब समय आ गया है कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाए। बजट खर्च न कर पाने वाले विभागों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू हो, जिसमें समयबद्ध कार्य न करने पर दंड और बेहतर क्रियान्वयन पर प्रोत्साहन का प्रावधान हो। साथ ही, योजनाओं की निगरानी के लिए पारदर्शी डिजिटल तंत्र विकसित किया जाए, ताकि हर रुपए की यात्रा जनता के सामने हो। 43 हजार करोड़ खर्च न कर पाने की यह ढिलाई एक चेतावनी है- यदि अब भी नहीं संभले, तो विकास की गाड़ी और पीछे छूटती ही जाएगी।

बड़ी खबरें

View All

जयपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग