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संपादकीय: आक्रामक नीतियों से परे संवाद का मार्ग ही समाधान

ईरान की सुरक्षा चिंताएं और उसकी शर्तें यह साफ संकेत देती हैं कि आपसी भरोसे की कमी अब भी कायम है।

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अनुज शर्मा - पश्चिम एशिया एक बार फिर इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां संघर्ष और शांति के बीच की दूरी बहुत कम रह गई है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुआ दो सप्ताह का युद्धविराम केवल एक कूटनीतिक विराम नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता की दिशा में खुलती एक संभावित खिड़की है। क्योंकि इस तनाव ने न केवल क्षेत्रीय संतुलन को डगमगा दिया है, बल्कि दुनियाभर की अर्थव्यवस्था को भी अस्थिरता के भंवर में धकेल दिया। इस युद्धविराम की महत्वपूर्ण शर्त होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने से जुड़ी है। होर्मुज विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल आया और ऊर्जा संकट गहराने लगा। ऐसे में इस मार्ग का पुन: खुलना केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक राहत का संकेत है। हालांकि, यह युद्धविराम जितना आशाजनक दिखता है, उतना ही नाजुक भी है। ईरान की सुरक्षा चिंताएं और उसकी शर्तें यह साफ संकेत देती हैं कि आपसी भरोसे की कमी अब भी कायम है। दूसरी ओर, इजरायल और अमरीका की रणनीतिक प्राथमिकताएं इस समीकरण को और जटिल बनाती हैं।

ऐसे में यह दो सप्ताह केवल वार्ता का समय नहीं, बल्कि विश्वास बहाली की एक कठिन परीक्षा भी है, जहां हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा। इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि युद्ध का प्रभाव सीमाओं से परे जाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। ऊर्जा संकट ने विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है, जहां पहले से ही महंगाई और आपूर्ति शृंखला से जुड़ीं समस्याएं मौजूद हैं। भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, इस अस्थिरता से सीधे प्रभावित होते हैं। यह युद्धविराम भारत सहित कई देशों के लिए राहत की सांस लेकर आया है, पर यह समझना जरूरी है कि सिर्फ अस्थायी विराम स्थायी समाधान का विकल्प नहीं हो सकता। यदि इस अवसर का उपयोग ठोस और दीर्घकालिक समझौते के लिए नहीं किया गया, तो यह संकट फिर सिर उठा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि अमरीका, इजरायल और ईरान एक समझौते पर सहमत हों। ऐसी स्थिति में ही कूटनीति की असली परीक्षा शुरू होगी व सभी पक्षों को संवाद और सहयोग का रास्ता अपनाना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता व आपसी विश्वास की जरूरत होगी।

कहा जा सकता है कि यह युद्धविराम शांति की दिशा में केवल एक शुरुआत है, न कि अंत। यह वैश्विक नेतृत्व के लिए एक अवसर है कि वे शांति, स्थिरता और सहयोग की नई दिशा तय करें। यदि इस अवसर को गंवा दिया गया, तो इसके परिणाम केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह भी समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, समाधान की राह वार्ता से ही खुलती है।