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बद्रीनाथ धाम से लौटे परिजनों को देख छलक पड़े आंसू

बद्रीनाथ धाम से लोग वापस लौट आए।

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raktim tiwari

Jun 30, 2015

बद्रीनाथ धाम में अतिवृष्टि और भूस्खलन में फंसे ब्यावर के श्रद्धालु ब्यावर लौट आए। उन्हें सकुशल देखकर परिजनों की आंखें छलछला गई। समाज के लोगों व परिजन ने उनका माला पहनाकर रेलवे स्टेशन पर स्वागत किया।

रेलवे स्टेशन पर अपनों को देख बद्रीनाथ से लौटे लोगों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। लगातार बरसात, पुल के बहाव में बहने व दोनों ओर के रास्ते अवरूद्ध होने से एकबारगी तो अपनों से मिलने की आस धूमिल होने लगी।

सरावगी मोहल्ला निवासी ललित कुमार अग्रवाल (51), स्नेहलता अग्रवाल (44), गोपाल जी मोहल्ला निवासी राधेश्याम गर्ग (62) व सुशीला गर्ग (58) गत 22 जून को बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए थे। 25 जून की सुबह पांच बजे मंगला आरती में भाग लिया। आरती के बाद वह दर्शन करके वापस सुबह आठ बजे रवाना हो गए।


अचानक हुए भूस्खलन व बरसात के कारण हनुमान चट्टी से तीन किलोमीटर पहले बनी संपर्क पुलिया पानी के तेज बहाव के साथ बह गई। इसी कारण बद्रीनाथ से वापस लौट रही तीन सौ बसें व अन्य छोटे वाहन फंस गए।


सहम जाते हैं मंजर याद कर
ललित अग्रवाल ने बताया कि बद्रीनाथ से नीचे उतरने के कुछ समय बाद ही भूस्खलन हो गया। पीछे की ओर जाने वाले तीनों रास्ते बंद हो गए। आगे की पुलिया पानी के बहाव से बह गई। अब केवल बीच रास्ते में ही खड़े रहकर अपनों को याद कर रहे थे। हनुमान चट्टी पहुंचने के दौरान अचानक उनका पैर फिसल गया। इससे वह दलदल में फंस गए, लेकिन वहां से निकल रहे लोगों ने उनकी पुकार सुनकर उन्हें बचा लिया। वो मंजर याद कर ललित अग्रवाल सिहर उठते हैं।

जाना था हरिद्वार पहुंच गए बद्रीनाथ

ललित ने बताया कि उनका केवल हरिद्वार तक जाने का ही मानस था। टिकट भी वेटिंग में था, फिर भी वह हरिद्वार वाली टे्रन में बैठ गए। आगे जाकर उनका टिकट कंफर्म हो गया। इसी कारण उनका हरिद्वार से बद्रीनाथ जाने का कार्यक्रम बन गया।

संघर्ष की दास्तां


अग्रवाल बताते हैं कि बद्रीनाथ से उतरने के कुछ समय बाद ही मूसलाधार बारिश होने लगी। आगे चलने पर हमारी गाड़ी के चंद कदमों के फासले पर तेज धमाके के साथ मानो पूरा पहाड़ ही रोड पर गिर पड़ा और सड़क धंसने लगी। मन में डर सताने लगा कि अब कहीं गाड़ी पर कोई चट्टान ना गिर पड़े या गाड़ी के नीचे से जमीन ना धंस पड़े। बारिश व ठंड के बीच करीब 36 घंटे कार में ही दुबके रहे।

हमारी गाड़ी के पीछे भी कई गाडिय़ां फंसी हुई थी। इनमें सैकड़ों यात्री सवार थे। इसी बीच पता चला कि बद्रीनाथ की तरफ जाने वाला रास्ता भी टूट गया है। मोबाइल की बैटरी भी जवाब दे चुकी थी। आखिर भगवान ने हमारी सुन ली। दोपहर एक बजे बाद संपर्क हुआ। घटना के दूसरे दिन लेखक ने ब्यावर में नेट से अधिकारियों व वरुण गांधी के नम्बर लिए उसी का परिणाम है कि स्थानीय प्रशासन की ओर से हमें सराहनीय मदद उपलब्ध कराई गई। पूर्व विधायक माणक डाणी भी लगातार इस मामले में अधिकारियों के संपर्क में रहे। जब तक हम सकुशल बाहर नहीं आ गए उन्होंने हमसे भी संपर्क साधे रखा।

...और वो हेलीपेड का रास्ता

हैलीपेड तक पहुंचने के लिए 12 से 15 किलोमीटर खड़ी पहाड़ी व पगडंडी का खतरनाक रास्ता पैदल तय करना आसान नहीं था। कभी चलते तो कभी बैठकर उतरते, लेकिन हमने हिम्मत जुटाई तथा जान बचाने के लिए हमारे साथ महिलाओं ने भी हिम्मत रखी। खाने-पीने का सारा सामान व सूटकेश सब कार में ही छूट गए। हमने पहाड़ों से बहता पानी ही पिया।

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