
एक्शन भी नहीं बन पाया 'ओम' का 'कवच'
आर्यन शर्मा @ जयपुर. हिन्दी फिल्म मेकर्स बार-बार घिसे-पिटे फॉर्मूलों को ही आजमा रहे हैं। फिल्म 'राष्ट्र कवच ओम' भी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है। इसमें एक अंडरकवर मिशन है। अकेला ही दर्जनों पर भारी पड़ने वाला 'सुपर' कमांडो है। देशभक्ति का 'तड़का' है और इमोशनल एंगल भी। लेकिन, सबकुछ अधूरा और अधपका-सा है। वजह है बेजान कहानी, जिसके ट्विस्ट और टर्न रोमांच पैदा करने की बजाय इरिटेट ज्यादा करते हैं। एक्शन सीक्वेंस खूब हैं, पर ये भी 'ओम' का 'कवच' नहीं बन पाते।
कहानी में ओम जांबाज और सबसे काबिल कमांडो है, जो अपने मिशन पर दुश्मनों को पलक झपकते ही चारों खाने चित करने में लगा है, लेकिन तभी उसे गोली लग जाती है। ब्रेन के पास गोली लगने से वह बेसुध अवस्था में बिस्तर पर है। इसी दौरान उसे अपना जलता हुआ घर और पिता को जबरन ले जाते कुछ लोग याद आते हैं। उसके पिता बार-बार कह रहे हैं- 'भाग ऋषि भाग'। सिर्फ इस 'एपिसोड' के अलावा वह अपनी मेमोरी खो चुका है..।
कहानी में ताजगी का अभाव है। पटकथा बेतरतीब और नीरस है, जो आरंभ से अंत तक बांधे रखने में विफल है। कपिल वर्मा का निर्देशन लचर है। एक्शन सीक्वेंस भी 'चरबा' ही हैं, यानी नया कुछ नहीं है। संवाद बेअसर हैं। म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर कमजोर है। सिनेमैटोग्राफी ठीक है, लेकिन एडिटिंग में गुंजाइश है। एक्शन 'अवतार' में आदित्य रॉय कपूर की फिजिक तो अच्छी है, पर उनका किरदार सलीके से नहीं गढ़ा गया। संजना सांघी महज एक एक्शन सीक्वेंस में जंची हैं, उसके अलावा उनके पास करने को कुछ खास नहीं है। आशुतोष राणा भरोसेमंद हैं। छोटे-से रोल में जैकी श्रॉफ इम्प्रेसिव हैं। प्रकाश राज कुछ अलग नहीं करते हैं। मां की भूमिका में प्राची शाह ठीक हैं। बहरहाल, 'रक्षा कवच ओम' को देखना अपने कीमती समय और मेहनत की कमाई को व्यर्थ लुटाने जैसा है।
रेटिंग: *
Published on:
02 Jul 2022 01:02 pm
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