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FMCG : खाद्य अपव्यय: भारत के फूड व एफएमसीजी उद्योग के सामने खड़ा बड़ा संकट

भारत का फूड और एफएमसीजी उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन इस विकास के समानांतर एक गंभीर और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला संकट भी गहराता जा रहा है। यह संकट है खाद्य अपव्यय। यह समस्या केवल उपभोक्ता स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पादन, भंडारण, वितरण और रिटेल- आपूर्ति श्रृंखला में फैली हुई है।

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जयपुर

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Murari

Jan 12, 2026

- उत्पादन, भंडारण, वितरण और रिटेल-पूर्ती आपूर्ति श्रृंखला में फैली है यह समस्या

- यह समस्या उत्पादन, भंडारण, वितरण व रिटेल आपूर्ति श्रंखला में फैली है

जयपुर। भारत का फूड और एफएमसीजी उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन इस विकास के समानांतर एक गंभीर और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला संकट भी गहराता जा रहा है। यह संकट है खाद्य अपव्यय। यह समस्या केवल उपभोक्ता स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पादन, भंडारण, वितरण और रिटेल- आपूर्ति श्रृंखला में फैली हुई है।

एक ओर देश में पोषण और खाद्य सुरक्षा चुनौती बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर प्रत्येक वर्ष लाखों टन ऐसा खाद्य उत्पाद नष्ट हो जाता है जो उपभोग योग्य होता है परन्तु अवधिपार हो जाता है। यह न केवल नैतिक और सामाजिक विफलता है, बल्कि जीडीपी क्षरण, संसाधनों की बर्बादी और पर्यावरणीय नुकसान का भी बड़ा कारण बनता जा रहा है।

फूड स्टार्ट-अप्स: सबसे अधिक प्रभावित

विशेष रूप से फूड स्टार्ट-अप्स इस संकट से बुरी तरह जूझ रहे हैं। नवाचार, गुणवत्ता और उत्पाद-डिजाइन में सक्षम होने के बावजूद, अधिकांश स्टार्ट-अप्स मार्केटिंग और वितरण दक्षता की कमी के कारण अपने उत्पादों को समय पर और सही बाजार तक नहीं पहुंचा पाते। परिणामस्वरूप, स्टार्ट-अप्स का एक बड़ा हिस्सा अपने उत्पादों को सप्लाई चेन के भीतर ही अवधिपार होते हुए देखता हैं। यह न केवल पूंजी का नुकसान है, बल्कि नवाचार और उद्यमशीलता के उत्साह को भी तोड़ता है।

अपव्यय की जड़ में छिपी समस्या

फूड और एफएमसीजी उद्योग में खाद्य अपव्यय का एक प्रमुख कारण है BackwardTraceability का अभाव। ट्रेसबिलिटी के अभाव में, सिस्टम समय रहते यह पहचान ही नहीं कर पाता कि कौन-सा उत्पाद जोखिम में है। यदि बैच-लेवल ट्रैकिंग और डेटा-ड्रिवन विज़िबिलिटी हो, तो अपव्यय को रोकना, घटाना और पुनःवितरित करना संभव हो सकता है।

बी2बी डिजिटल प्लेटफॉर्म: अपव्यय से पुनर्वितरण की ओर

इस समस्या का एक व्यावहारिक और स्केलेबल समाधान है- एक डेडिकेटेड बी2बी डिजिटल प्लेटफॉर्म, जहां व्यापारी, डिस्ट्रीब्यूटर और ब्रांड्स अपने उन उत्पादों को सूचीबद्ध कर सकें, जिनकी एक्सपायरी तिथि नज़दीक है। इससे एक स्थान पर अटके उत्पाद, दूसरे स्थान पर मांग पूरी करने का साधन बन सकते हैं। यह दृष्टिकोण अपव्यय को व्यवस्थित पुनर्वितरण में बदल देता है।

नुकसान नहीं, समाधान का रास्ता

निकट-एक्सपायरी उत्पादों के लिए DistressPricing को अक्सर गलत नज़र से देखा जाता है, जबकि यह एक व्यावहारिक और जिम्मेदार व्यापार मॉडल है। ऐसे मामलों में विक्रेता को उच्च मार्जिन छोड़कर, कम कीमत पर उत्पाद बेचकर अपने मूल निवेश की भरपाई कर सकता है। वहीं खरीददार को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद किफायती दरों पर मिलता है। यह मॉडल उत्पाद को नष्ट होने से बचाता है। व्यापारियों के नुकसान को सीमित करता है और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है।

सरकार की भूमिका: नीति से प्लेटफॉर्म तक

इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब सरकार की सक्रिय भूमिका अनिवार्य हो जाती है। आवश्यकता है कि सरकार राष्ट्रीय स्तर की फूड और एफएमसीजी कंपनियों को निर्देशित करे कि वे इस तरह के बी2बी प्लेटफॉर्म के विकास में निवेश करें। इसे उद्योग-व्यापी और लोकतांत्रिक बनाएं और इसे केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधन संरक्षण पहल के रूप में देखें। खाद्य अपव्यय सीधे-सीधे जीडीपी क्षरण से जुड़ा हुआ है। यदि उत्पाद नष्ट होते हैं, तो मूल्य सृजन भी नष्ट होता है। ऐसे प्लेटफॉर्म में निवेश, वास्तव में आर्थिक संरक्षण और स्थिरता में निवेश होगा।

वर्जन

खाद्य अपव्यय केवल एक नैतिक या सामाजिक समस्या नहीं है। यह एक संरचनात्मक और डेटा-केंद्रित चुनौती है। फूड स्टार्ट-अप्स विशेष रूप से इस संकट से जूझ रहे हैं। यदि उद्योग और सरकार मिलकर बैकवर्ड ट्रेसबिलिटी और बी2बी पुनर्वितरण प्लेटफॉर्म्स को अपनाएं, तो न केवल अपव्यय घटेगा, बल्कि जीडीपी क्षरण को भी रोका जा सकेगा।

- मनीष जैन, वाइस प्रेसिडेंट, किराना किंग, जयपुर