
राजस्थान का रण : कोई भुला न सका यह नारा...
जयपुर। जिसका कोई न पूछे हाल, उसके संग गिरधारी लाल...यह नारा 1989 के लोकसभा चुनाव में जब गली-गली में गूंजा तो कांग्रेस से चुनाव लड़े ब्रिगेडियर भवानी सिंह को करारी हार का समना करना पड़ा।
यही वो नारा था, जिसके चुनाव को एक राजा और आम आदमी की लड़ाई में तब्दील कर दिया था। भवानी सिंह जयपुर शाही परिवार के सदस्य थे, जबकि भाजपा से चुनाव लड़ रहे गिरधारीलाल भार्गव साधारण परिवार से थे। मुझे अच्छी तरह याद है गिरधारी लाल के लिए यह एक नारा नहीं बल्कि उनके जीवन से इसका अमिट जुड़ाव भी देखने को मिला। 1989 के चुनाव प्रचार के दौरान एक रात को उन्हें शिवदासपुरा के समीप एक जने का शव पड़ा मिला।
उन्होंने रातों रात इस शव को उसके परिवार तक पहुंचाया। उस रात वह सोए भी नहीं और अगले दिन सुबह वापस से प्रचार में जुट गए। इसके बाद गांव-गांव तक उनके इस काम की शोहरत पहुंच गई। इसी तरह आमेर से शादी का निमंत्रण उन्हें मिला था, लेकिन प्रचार में व्यस्तता के चलते उन्हें देर हो गई। इसके बावजूद वह रात ढाई बजे पहुंचे और दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद दिया। वह तड़के पांच से देर रात दो-ढाई बजे तक प्रचार करते थे। रात को लोग सो जाते तो उन्हें जगाकर अपनी बात कहने से भी भार्गव गुरेज नहीं करते थे।
इसके अलावा वह स्कूटर पर ही शहर में जनसंपर्क करना पसंद करते थे।
शहर के परकोटे में स्थित चौकडिय़ों से गुजरते समय वह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आवाज लगाते चलते और उनकी समस्याओं के बारे में पूछते। यदि कोई परेशानी सामने आती तो उससे संबंधित महकमे के अफसर को तत्काल फोन करते और कह देते कि यदि यह काम नहीं हुआ तो वह धरना देना शुरू कर देंगे।
शादी और मौत के कार्यक्रम की जानकारी मिलने पर वह इसमें आवश्यक रूप से शामिल होते थे। खासतौर पर मौत के कार्यक्रमों में, कई बार वह दूसरे लोगों की अस्थियों का विसर्जन करने हरिद्वार तक गए।
कैलाशनाथ भट्ट, पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता
Published on:
14 Sept 2018 07:10 am
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