
पर्वतीय पर्यटन स्थल वनस्पति की दृृष्टि से ही अपनी विशेष पहचान नहीं रखता अपितु वन्य जीव-जंतु व पशु-पक्षी जगत के लिए भी ये पहाडिय़ां अपनी अलग ही पहचान रखती हैं।
यहां आबू की लालछौह, पेट चरखी, आबू की सिपाही बुलबुल, दुर्लभ प्रजातियों में से एक हरी मुनिया समेत कई प्रजातियां यहीं पाई जाती हैं।
ओरिया, बेमाली माता, सालगांव व अचलगढ़ क्षेत्र में व्यापक स्तर पर ग्रीन मुनिया की उपस्थिति देखी गई है। जो पक्षी प्रेमियों के लिए सुखद ही नहीं बल्कि एक बड़े पैमाने पर शोध का विषय भी मिल गया है।
ओरिया क्षेत्र को ग्रीन मुनिया का आश्रय स्थल कहा जाने में भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी तरह सनराईज वैली में भी ग्रीन मुनिया को देखा गया
है। यहां पाया जाने वाला लाल कलगी, काले सफेद रंग की गर्दन, जगह जगह सुनहरे रंग का सम्मिश्रण लिए जंगली मुर्गा भी अपने आप में अलग ही पहचान रखता है।
सरकारी उपेक्षा का शिकार
पक्षी प्रेमी महेंद्रदान ऊर्फ चार्ली के अनुसार सरकारी उपेक्षाओं के चलते यह क्षेत्र गुमनामी का दंश झेल रहा है। पर्यावरण प्रदूषण, प्रकृति के विनाश को रोकने के लिए कोई कारगर योजनाएं क्रियान्वित नहीं की जा रही हैं। वन व वन सम्पदा की सुरक्षा व सरंक्षण के लिए जनजागृति उत्पन्न करने की आवश्यकता है।
पक्षियों के आवास के लिए यह क्षेत्र अपने आप में अहम है। यहां करीब तीन सौ से भी अधिक प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं जिनमें से अनुमानत: डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियों को पर्वतीय पठारी भाग की पहाडिय़ों में स्वच्छंद अठखेलियां करते, करीब डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियों को पहाड़ों के तलहटी वाले क्षेत्रों में देखा गया है।
केजी श्रीवास्तव, उप वन सरंक्षक, माउंट आबू
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