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यहां बने पर्यटन सर्किट तो लोगों को मिले रोजगार

सीतामाता अभयारण्य के आस-पास पर्यटन विभाग और वन विभाग ध्यान दें तो यह क्षेत्र पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित हो सकता है। यहां के पर्यटन पर विकास को गंभीरता से लिया जाए तो यहां पर पर्यटन उद्योग की संभावना बनती है। ऐसे में स्थानीय लोगां को रोजगार भी मिल सकता है।

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sandeep srivastava

Apr 20, 2016

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कांठल में कई स्थान पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, वहीं इन स्थानों से निकटवर्ती शहरों का सीधा जुड़ाव नहीं होने से पर्यटकों की नजर से दूर हैं। केवल सीतामाता अभयारण्य में ही पर्यटकों की संख्या कभी-कभी ही दिखाई देती है। इस कारण अभयारण्य में पर्यटनों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो रहा है।

पर्यटन विभाग और वन विभाग की ओर से यहां के विभिन्न स्थानों पर थोड़ा सा ध्यान दें तो यह क्षेत्र पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित हो सकता है। यहां के पर्यटन पर विकास को गंभीरता से लिया जाए तो यहां पर पर्यटन उद्योग की संभावना बनती है। ऐसे में स्थानीय लोगां को रोजगार भी मिल सकता है।

नेशनल पार्क की दरकार
प्रदेश की प्रमुख थाती के साथ ही जैव विविधताओं को अपने आगोश में समेटे समृद्धशाली एवं प्रदेश में अपनी एक अलग ही पहचान रखने वाले सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य को नेशनल पार्क की दरकार है। सीतामाता अभयारण्य की भौगोलिक स्थितियां प्रदेश के अन्य अभयारण्यों के मुकाबले इसे अलग ही पहचान दिलाती हैं। पर्यावरणविद् व वन सुरक्षा समिति प्रतापगढ़ के अध्यक्ष लक्ष्मणसिंह चिकलाड़ का कहना है कि कांठल में सीतामाता अभयारण्य में पर्यटक आते हंै। इसके साथ ही अन्य स्थान भी हैं, जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन स्थानों के लिए भी पर्यटन विभाग और सरकार को प्रयास करने चाहिए।


अभयारण्य में हैं तीन ईको ट्यूरिज्म सेंटर

सीतामाता अभयारण्य में विभाग की ओर से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए तीन स्थानों पर ईको ट्यूरिज्म सेंटर बनाए गए हैं। इन स्थानों में आरामपुरा, पुंगातालाब और जाखम को विकसित किया गया है।

इन स्थानों पर पर्यटकों के ठहरने, आवास सुविधा, भोजन आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है। इन स्थानों पर ईडीसी (इको डवलपेंमट कमेटी) की ओर से पर्यटकों को यहां सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कमेटी के कुछ सदस्यों को पर्यटन विभाग उदयपुर की ओर से प्रशिक्षण भी दिया गया है। इसमें केयर व रसोईयां का प्रशिक्षण दिया है। इसके अलावा इन स्थानों पर ट्री हट भी बनाई गई हैं।

जैव विविधताओं का संगम है सीतामाता अभ्यारण्य
सीतामाता अभयारण्य अरावली, विंध्याचल व मालवा के पठार के बीच स्थित है। इससे यहां पर जैव विविधता का संगम होता है। यहां पाए जाने वाली उडऩ गिलहरी और चौसिंगा अभयारण्य की शान है। उडऩ गिलहरी तो सीतामाता की परी के रूप में जानी जाती है। सीतामाता अभ्यारण्य में करीब आठ सौ प्रकार के विशालकाय से लेकर छोटे पेड़-पौधों पाए जाते हैं।

यहां पर 300 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों व 50 से अधिक चौपाया व स्तनधारी की पहचान हो चुकी हैं। सैकड़ों प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती है। जिसमें बहुमूल्य बूटियां भी मौजूद हैं। यहां पर अब तक 2 सौ से अधिक औषधीय पादप की पहचान हो चुकी है। यहां की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है कि अभयारण्य में सीतामाता, करमोई समेत आधा दर्जन नदियां बारहोमास बहती हैं। वातावरण सभी प्रकार के पक्षियों के लिए स्वर्ग माना गया है।

साढ़े 11 हजार से सवा नौ लाख का प्रवेश शुल्क
सीतामाता अभयारण्य में वर्ष 2015-16 में कुल 11 हजार 541 लोगों ने भ्रमण किया। इस दौरान प्रवेश शुल्क के रूप में विभाग को नौ लाख 25 हाजर सात सौ रुपए रुपए की आय हुई। इसमें यहां ठहरने का खर्चा अलग से हैं।

कर रहे हैं प्रयास
सीतामाता अभयारण्य को ईको ट्यूरिज्म के लिए हम प्रयास कर रहे है। हालांकि अभी यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हैं। लेकिन गत वर्षों के मुकाबले इजाफा तो हो रहा है। आवागमन के साधनों के कारण यहां पर्यटक कम आते हैं। यहां सुविधाएं बढ़ाने के लिए प्रस्ताव बनाकर सरकार को भिजवाए गए हैं। -हेमचन्द्र जाट, सहायक वन संरक्षक, सीतामाता अभयारण्य

वर्ष 2015-16 में पर्यटकों के आंकड़े

वर्ग संख्या
देशी 7459
विदेशी 35
छात्र 4047
कुल 11541
(आंकड़े विभाग के अनुसार)

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