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हाईकोर्ट ने यौन अपराधों के क़ानून को लेकर जताई नाराज़गी, कहा – बच्चों के लिए केवल बातें खूब होती हैं लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं होता

हाईकोर्ट ने यौन अपराधों के क़ानून को लेकर जताई नाराज़गी, कहा - बच्चों के लिए केवल बातें खूब होती हैं लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं होता

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जयपुर

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rohit sharma

Apr 13, 2018

District public prosecutor

COURT

जयपुर

हाईकोर्ट बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों के लिए बने पोक्सो कानून के मामलों की सुनवाई के लिए अलग से सभी जिलों में अदालतें नहीं खोलने पर नाराजगी जताई है। अदालती आदेश से हाजिर हुए मुख्य सचिव एन.सी.गोयल और श्रम सचिव टी.रविकांत को कोर्ट ने कहा कि बच्चों के लिए केवल बातें खूब होती हैं लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं होता दिखता। न्यायाधीश मनीष भंडारी व न्यायाधीश डी.सी.सोमानी की बैंच ने जनता के धन के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए मुख्य सचिव से पूछा कि पोक्सो एक्ट के तहत विशेष अदालतें क्यों नहीं खोली जा रही हैं ? अदालत ने मुख्य सचिव को एक महीने में पोक्सो एक्ट के तहत विशेष अदालतें खोलने का रोडमैप पेश करने का निर्देश दिया है। इस दौरान मुख्य सचिव ने अदालत को बताया कि सरकार के अधीन संचालित अदालतों को हाईकोर्ट प्रशासन के अधीन करने के मुद्दे पर निर्णय करके अदालत को अवगत करवा दिया जाएगा।

न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती सरकार !

अदालत ने अदालतों में संसाधनों की कमी पर कहा कि एेसा लगता है कि सरकार न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती। हालात यह हैं कि अधीनस्थ अदालतों में आवश्यकता के अनुरुप कम्पयूटर तक उपलब्ध नहीं हैं। अदालत ने श्रम सचिव से कहा कि कोटा की लेबर कोर्ट के न्यायाधीश ने संसाधन मुहैया कराने के लिए पत्र लिखा लेकिन, सरकार ने पत्र का जवाब तक नहीं दिया। जबकि प्रदेश में लेबर एक्ट से संबंधित सबसे अधिक प्रकरण कोटा में ही चल रहे हैं। सरकारी रवैए से खफा अदालत ने कहा कि कोर्ट के अधिकारी सरकार की दया पर नहीं रह सकते। बेहतर हो कि श्रम सचिव सभी लेबर कोर्ट को पर्याप्त स्टॉफ और संसाधन मुहैया करवाने तक बिना स्टॉफ के काम करें ताकि उन्हें समस्या का आभास हो सके।

यह है मामला-

राजस्थान राज्स विधिक सेवा प्राधिकरण ने याचिका दायर कर राज्य के सभी जिलों में पोक्सो एक्ट के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें नहीं खोलने की शिकायत की है। याचिका में कहा है कि पोक्सो अधिनियम की धारा 28 के अनुसार प्रत्येक जिले में अलग से विशेष अदालत खुलनी चाहिएं। लेकिन सरकार ने केवल जयपुर जिले में ही विशेष अदालत गठित की है। जबकि कानून में प्रावधान है कि पीडित बच्चे की पहचान किसी भी प्रकार से सार्वजनिक नहीं हो सकती और इसके लिए विशेष अदालतों को सामान्य अदालत परिसर से अलग खोलने का प्रावधान किया गया है।