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‘फ़िराक़ गोरखपुरी शायरी में रहे हिंदुस्तानियत के हामी’

मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ( Firaq Gorakhpuri ) रघुपति सहाय का जन्म गोरखपुर ( Gorakhpur ) के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहे। हिंदी का उन्हें आलोचक कहा गया, अलबत्ता उन्होंने हिंदी के शब्दों का प्रयोग अपनी रुबाइयों में बखूबी कर कई बार इसे मिथक साबित किया। यह विचार जयपुर के जवाहर कला केंद्र में फ़िराक़ गोरखपुरी की जयंती पर 28 अगस्त को राजस्थान उर्दू अकादमी और जवाहर कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में हुई विचार गोष्ठी के पहले सत्र में विद्वानों ने प्रतिपादित किया।

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'फ़िराक़ गोरखपुरी शायरी में रहे हिंदुस्तानियत के हामी'

'फ़िराक़ गोरखपुरी शायरी में रहे हिंदुस्तानियत के हामी'

प्रसिद्ध शायर फ़िराक़ गोरखपुरी मानो शायरी के लिए बने और उनकी शायरी और रुबाइयों को पढ़ने, समझने से लगता है, मानो वह भी उनकी मुरीद हो चुकी थी। तभी तो कहते थे, ‘मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू जुबां...जो भी मैं कहता गया हुस्न-ए-बयां होता गया’

फ़िराक़ का पहला नाम 'महंगू'

उर्दू और फारसी के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ( Firaq Gorakhpuri ) यानी रघुपति सहाय 'फ़िराक़' का नाम 'महंगू' था, वज़ह 1896 में वक़्ते पैदाइश महंगाई का शुमार था, इसलिए पिताजी मुनीश गोरख प्रसाद ने इनका नाम महंगू राम रख दिया। फिर, नाम रघुपति सहाय हुआ।
यह बात गिने-चुने लोगों को ही मालूम होगी। यह बात बताई देश-दुनिया के मशहूर शायर शीन क़ाफ़ निज़ाम ( Sheen Kaaf Nizam ) ने विचार गोष्ठी के पहले सत्र में ।
मशहूर शायर शीन क़ाफ़ निज़ाम ने 'फ़िराक़' के साथ गुज़रे वक्त की कई यादेें ताजा की। उनकी शायरी, रुबाई, गज़ल का बखूबी विश्लेषण किया। उन्होंने कहा,फ़िराक़ शायरी में हिंदुस्तानियत के हामी रहे।

रात बनी है लिखने के लिए

विचार गोष्ठी में शीन काफ निज़ाम के साथ ही मौजूद तमाम आलिम 'विद्वान' इस बात पर एकराय थे कि फ़िराक़ गोरखपुरी मानते थे कि रात सोने के लिए नहीं, लिखने के लिए बनी है। ऐसी ही किसी रात में चांद—तारों की चश्मदीद गवाही में एक ऐसी रोशनी फूटी, जिसने 'रघुपति सहाय' में से 'फ़िराक़ गोरखपुरी' का दिव्य रूप दुनिया को दिया।

रुबाइयों में वात्सल्य

शीन काफ निज़ाम ने कुछ रुबाइयां पेश करते हुए इस मिथक से दीगर कि फ़िराक़ इश्कीया शायर थे, बताया कि उनकी रुबाइयों में जो वात्सल्य झलकता है, वह काबिल-ए-ग़ौर है। साथ ही, यह कि फ़िराक़ ने अपने लफ्ज़ों का भी प्रयोग किया। वे जिद्द पर अड़े बच्चे के लिए नया अल्फाज़ गढ़ते हैं 'जिदयाया'—
आंगन में ठुनक रहा है जिदयाया है, बालक तो हई चांद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है मां, देख आईने में चांद उतर आया है।
इसी तरह, शीन क़ाफ़ निज़ाम ने रुबाई के जरिए बताया कि और कहीं ऐसा प्रयोग नहीं मिल सकता कि लोरी सुनाती मां की 'हिलती सुडौल बांह गोरी—गोरी' की बात की जाए, मगर फ़िराक़ करते हैं—
'किस प्यार से दे रही है मीठी लोरी, हिलती है सुडौल बांह गोरी-गोरी
माथे पे सुहाग आंखों मे रस हाथों में, बच्चे के हिंडोले की चमकती डोरी'
निज़ाम कहते हैं, 'रुबाई या शायरी पढ़ना भी एक हुनर है, तभी उसके भाव को समझा जा सकता है और सही ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है।' उन्होंने फ़िराक़ की यह रुबाई उद्धृत की—
'किस प्यार से होती है ख़फा बच्चे से, कुछ त्योरी चढ़ाए मुंह फेरे हुए
इस रूठने पे प्रेम का संसार निसार, कहती है कि जा तुझसे नहीं बोलेंगे'

परिचर्चा के इस सत्र का आग़ाज हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी की सदारत में हुआ।

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