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अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस आज-हमें पहचान दिलाने वाला राष्ट्रीय खेल हॉकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खो रहा अपनी चमक

सुविधाओं की दरकार,ओलपिंक खेलों में भारत को पहला पदक मिला था हॉकी में

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Hockey, the national sport that gave us recognition

Hockey, the national sport that gave us recognition

जयपुर
आज दुनियाभर में विकास और शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जा रहा है। आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत 6 अप्रैल 1896 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में हुई। तभी से प्रतिवर्ष 6 अप्रैल को हम अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस मनाते आ रहे हैं।

ओलंपिक खेलों में भारत की पदक प्राप्ति की शुरुआत हॉकी के खेल के जरिए 1928 में मेजर ध्यानचंद की स्टिक से हुई। लेकिन ओलपिंक के खेलों में पदक का श्रीगणेश करने वाला हमारा यह राष्ट्रीय खेल हॉकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुविधाओं के अभाव में अपनी चमक खो रहा है।

अब तक कुल 24 बार ओलंपिक खेलों का आयोजन हो चुका है, पिछला ओलंपिक टोक्यो 2020 जो कोरोना के कारण 2021 में खेला गया। भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी टोक्यो में ही रहा। जब हमारे देश के खिलाड़ियों ने एक स्वर्ण ,दो रजत एवं चार कांस्य पदकों सहित कुल 7 पदक प्राप्त किए। ओलंपिक में प्राप्त भारत के कुल पदकों की संख्या 35 है जिनमें 10 स्वर्ण पदक भी हैं और इन 10 में से 8 बार हम हॉकी में स्वर्ण पदक प्राप्त करने में कामयाब रहे। इन आंकड़ों से ही प्रतीत होता है कि इतना बड़ा देश होते हुए भी खेलों की दुनिया में हमारा योगदान बहुत कम है।

उसका कारण माना जाता है कि 1896 जब से ओलंपिक की शुरुआत हुई तब से लेकर 1947 तक भारत गुलाम था। जिसमें खेलों के विकास के लिए अंग्रेजी सरकार ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया,और ना ही कोई आर्थिक मदद खिलाड़ियों को दी। 1928 1932 और 1936 की ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम को ओलंपिक में भाग लेने के लिए दानदाताओं पर निर्भर करना पड़ा। देश आजाद हुआ मगर खेलों के विकास की तरफ हमारी सरकारों का बहुत कम ध्यान रहा।

47 साल में भारत को विश्व कप में नहीं मिला पदक
1948 में हमारी हॉकी टीम ने फिर से ओलपिंक में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। जो सिलसिला 1952 और 1956 में भी जारी रहा। 1960 में हम दूसरे स्थान पर खिसक गए और 1964 में हमने फिर टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। 1968 और 1972 में हमें कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद 1975 में विश्व कप हॉकी में हमें हॉकी विश्व चैंपियन होने का गौरव प्राप्त हुआ।

15 मार्च 1975 को पाकिस्तान से खेले गए इस रोमांचक मैच में टीम 1गोल से पिछड़ रही थी। लेकिन अंतिम क्षणों में मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने गोल कर भारत का विश्व विजेता बना दिया। लेकिन जब से लेकर आज तक 47 साल में भारत को विश्व कप हॉकी में दोबारा से कोई पदक नहीं मिल सका। हालांकि 1980 मास्को ओलंपिक मैं हमारे देश द्वारा हॉकी का स्वर्ण पदक अंतिम बार प्राप्त किया गया और उसके करीब 41 साल बाद टोक्यो ओलंपिक 2020 में हमारे युवा हॉकी खिलाड़ियों ने ओलंपिक में कांस्य पदक प्राप्त कर हॉकी के पुनर्जन्म का संकेत दिया।

प्रोत्साहन राशि बढ़ी लेकिन सुविधाओं का अभाव
खिलाड़ियों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि तो मिली है। लेकिन ग्राउंड लेवल पर अभी भी सुविधाओं का बहुत अभाव है। हॉकी जिसने हमें सर्वाधिक 8 स्वर्ण पदक दिए उसके लिए आज की आवश्यकता एस्ट्रो टर्फ का मैदान उपलब्ध ना होने से खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाकर पिछड़ जाते है।
राजस्थान में सिर्फ 3 मैदान
देश में करीब 70 एस्ट्रो टर्फ है। जिसमें से राजस्थान में तो सिर्फ तीन ही मैदान अजमेर,कोटा जयपुर में है। वहीं छोटे से देश होलेंड में 600 एस्ट्रो टर्फ के मैदान है। हॉकी कोच व पूर्व खिलाड़ी रघुनंदन सिंह का कहना है कि राजस्थान में कम से कम हर जिले में हर खेल की सुविधाएं होनी चाहिए।

एक समय था जब ओलंपिक पदक लाने के लिए किराया भी अपनी जेब से भरना पड़ता था। वहीं भारत को विश्वकप में हॉकी चैंपियन बनाने वाले मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने बताया कि पहले के खेल मैदान और तकनीक में परिवर्तन हो गया है। वर्तमान तकनीक से जुड़ी स्थानीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर ही हम फिर से विश्व में अपना डंका मनवा सकते है।