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कैसे हो वनों का विकास, अतिक्रमण हटें तो बने बात

राजस्थान के शहरों में हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। इसके बावजूद वन भूमि के अतिक्रमण नहीं हट पा रहे हैं। पूरे प्रदेश में वन भूमि पर 25 हजार से ज्यादा अतिक्रमण हैं। मगर इन अतिक्रमणों को हटाने में विभाग मुस्तैद नजर नहीं आ रहा है।

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जयपुर

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Umesh Sharma

Nov 17, 2022

कैसे हो वनों का विकास, अतिक्रमण हटें तो बने बात

कैसे हो वनों का विकास, अतिक्रमण हटें तो बने बात

जयपुर। राजस्थान के शहरों में हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। इसके बावजूद वन भूमि के अतिक्रमण नहीं हट पा रहे हैं। पूरे प्रदेश में वन भूमि पर 25 हजार से ज्यादा अतिक्रमण हैं। मगर इन अतिक्रमणों को हटाने में विभाग मुस्तैद नजर नहीं आ रहा है। वन विभाग की ओर से ही पुलिस के सहयोग से अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई की जाती है। मगर ये कार्रवाई समय पर नहीं होती है, जिसके चलते अतिक्रमियों के हौंसले बुलंद हैं। विभाग दावा कर रहा है कि ज्यादातर अतिक्रमण 1980 के पहले के हैं, जब वन संरक्षण अधिनियम नहीं बन पाया था। इन कब्जों को हटाने के लिए न्यायालय में वाद चल रहा है।

सरकार का दबाव भी वजह

शहरी क्षेत्रों के पास वनभूमि पर कच्ची बस्तियां बसी हुई हैं। वोटबैंक होने की वजह से सरकारें इन कच्ची बस्तियों का नियमन करना चाहती है, लेकिन वन संरक्षण अधिनियम में इस तरह का प्रावधान नहीं होने की वजह से मामला अटका हुआ है।


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ये अधिकार, मगर प्रयोग नहीं

वनभूमि पर अगर फैक्ट्री, संस्थान, सरकारी विभाग या अन्य कोई व्यक्ति जान-बूझकर अतिक्रमण करता है तो वन संरक्षण अधिनियम के तहत तुरंत उस अतिक्रमण को हटाया जाता है। साथ ही संबंधित व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा भी चलता है।

यूं समझे अतिक्रमण कैसे बन रहा है जंजाल

प्रदेश के ज्यादातर जिलों में वनभूमि पर अतिक्रमण हैं। लेकिन सर्वाधिक 6178 अतिक्रमण उदयपुर जिले में हैं। इसके बाद बारां में 3966 और कोटा में वनभूमि पर 2499 अतिक्रमण हैं। इसी तरह सीकर में 1896 और चूरू में 1459 अतिक्रमण हैं। वहीं सबसे कम अतिक्रमणों की बात की जाए तो बांसवाड़ा और टोंक में अतिक्रमण का एक भी मामला नहीं है। इसके बाद जालौर में एक, जैसलमेर में 10, भीलवाड़ा में 11 और चित्तौड़गढ़ में 15 अतिक्रमण के मामले हैं। वहीं जयपुर की बात की जाए तो वनभूमि पर 316 कब्जे हैं।

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डेढ़ लाख हैक्टेयर भूमि का नामांतरण खुलवाया

जमीनों के गलत नामांतरण को लेकर भी वन विभाग की राजस्व विभाग से लड़ाई चलती रहती है। लेकिन पिछले कुछ समय से यह लड़ाई कुछ कम हुई है। एक साल में करीब डेढ़ लाख हैक्टेयर भूमि का नामांतरण खुल चुका है। विभाग नोटिफिकेशन निकालकर प्रस्ताव कलेक्टर को भेजता है और वहां से नामांतरण खुलवाने की कार्रवाई होती है। इसके अलावा संभागीय आयुक्त के स्तर पर भी एक कमेटी बनी है। इसमें वन विभाग के सीसीएफ सदस्य सचिव हैं, जबकि कलेक्टर और डीएफओ सदस्य हैं। इस बैठक में भी वन विभाग के नाम जमीनों पर अतिक्रमण सहित कई मुद्दों पर चर्चा होती है।

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वनभूमि के कब्जों पर विभाग समय-समय पर कार्रवाई करता है। मगर कई मामले कोर्ट में विचाराधीन होने या वन संरक्षण अधिनियम 1980 के बनने से पहले के हैं, इस वजह से भी कार्रवाई अटकी हुई है।

डी.एन. पाण्डे, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन विभाग