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देश में हर 6वां व्यक्ति तनाव में- depressed pepole in india

जयपुर। माइग्रेन या डिप्रेशन को मामूली समझकर हम अक्सर दर्द निवारक दवाओं से ही इसका इलाज कर लेते हैं और चुपचाप अपने डिप्रेशन को छिपा लेते हैं। लेकिन ये तनाव आगे चलकर जीवन के लिए बड़ी परेशानी खड़ा करता है, क्योंकि सामाजिक तौर पर इसे बीमारी नहीं समझा जाता। ऐसे में इलाज भी नहीं होता। यही कारण है कि आज विश्व में सबसे तनावग्रस्त लोगों में भारत तीसरे नंबर पर है। देखिए एक रिपोर्ट

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जयपुर

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Tasneem Khan

Nov 12, 2019

जयपुर। माइग्रेन या डिप्रेशन को मामूली समझकर हम अक्सर दर्द निवारक दवाओं से ही इसका इलाज कर लेते हैं और चुपचाप अपने डिप्रेशन को छिपा लेते हैं। लेकिन ये तनाव आगे चलकर जीवन के लिए बड़ी परेशानी खड़ा करता है, क्योंकि सामाजिक तौर पर इसे बीमारी नहीं समझा जाता। ऐसे में इलाज भी नहीं होता। यही कारण है कि आज विश्व में सबसे तनावग्रस्त लोगों में भारत तीसरे नंबर पर है। देखिए एक रिपोर्ट

यदि आंकड़े यह कह रहे हैं कि दुनिया के सबसे तनावग्रस्त लोग भारत में रहते हैं, तो यह वाकई चिंतनीय विषय है। एक शोध के मुताबिक अमेरिका और चीन के बाद भारत इस मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर है। तो यही से हमें अपने लिए अलर्ट समझ लेना चाहिए। डेंगू और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों पर देश में तुरंत अलर्ट घोषित कर दिया जाता है, लेकिन तनाव को लेकर चिकित्सा विभाग का कोई रिएक्शन नहीं आना हमारी सोच के लिए और भी खतरनाक हो सकता है। क्योंकि सामाजिक तौर पर डिप्रेशन को छिपा लेना ही ठीक समझा जाता है, बजाय इसे बीमारी कहने के। साथ ही लोग साइकोलॉजिस्ट के सामने से गुजरना भी शर्म के तौर पर लेते हैं। आंकड़ों की बात करें तो देश में हर छठा व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है। देश में मेंटल हैल्थ सर्वे 2015—16 में किया गया था। उसकी बात करें तो देश के साढे छह परसेंट लोग आज तनाव को लेकर बेहद क्रिटिकल हालत में हैं। वहीं सामान्यतया मामले एंजाइटी, सिजोफ्रेनिया और बाइपॉलर डिस्आॅर्डर के हैं। इन्हें भी इतना सामान्य लिया जा रहा है कि लोग अब तनाव के मुश्किल हालात से गुजर रहे हैं। इतना कि देश में एक मेंटल हैल्थकेयर बिल की आवश्यकता भी जताई जाने लगी है। क्योंकि यह तनाव सिर्फ किसी विशेष एज ग्रुप तक ही सीमित नहीं रहा। देश के हर उम्र के व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य के लिए इलाज की जरूरत अब महसूस की जाने लगी है। इसीलिए मेंटर हैल्थ केयर बिल पर जोर देने की बात इस शोध में भी कही गई, ताकि हर व्यक्ति तक इलाज पहुंच सके।

डॉक्टरी सलाह या साइकोलॉजिस्ट की बात करें तो मेंटल हैल्थ सर्वे में बताया गया कि देश में एक लाख लोगों पर एक मेंटल हैल्थ वर्कर यानी साइकोलॉजिस्ट है। देशभर में मात्र पांच हजार के करीब साइकोलॉजिस्ट हैं, जो यहां के लोगों के तनाव के मुकाबले कुछ भी नहीं। वहीं सर्वे यह भी कहता है कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का इलाज देश में महंगा है, खासकर दवाइयां। दवाइयां इतनी महंगी है कि आम लोग चाहकर भी ये इलाज नहीं करवा सकते। इसके लिए सरकार को इस इलाज और दवाइयों को सस्ते से सस्ते दरों पर उपलब्ध कराए जाने की जरूरत भी जताई गई है।