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वायुसेना के हवाई अड्डों पर लगे उपकरण 1976 के, जंग के लिए नहीं हैं फिट

पाकिस्तान और चीन के दोहरे मोर्चे पर देश की रक्षा जिम्मेदारियां संभाल रही सेनाओं की तैयारियों में भारी कमी नजर आ रही है। सीएजी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वायुसेना के हवाई अड्डे युद्धकाल के लिए फिट नहीं हैं। यहां स्थापित उपकरण 1976 के हैं, जो विंटेज कैटेगरी में आते हैं।कुछ समय पूर्व एक संसदीय समिति ने भी कहा था कि थल सेना के पास 68 फीसदी हथियार संग्रहालय में रखने लायक हैं।

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पाकिस्तान और चीन के दोहरे मोर्चे पर देश की रक्षा जिम्मेदारियां संभाल रही सेनाओं की तैयारियों में भारी कमी नजर आ रही है। सीएजी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वायुसेना के हवाई अड्डे युद्धकाल के लिए फिट नहीं हैं। यहां स्थापित उपकरण 1976 के हैं, जो विंटेज कैटेगरी में आते हैं।कुछ समय पूर्व एक संसदीय समिति ने भी कहा था कि थल सेना के पास 68 फीसदी हथियार संग्रहालय में रखने लायक हैं। अब वायुसेना की तैयारियों को लेकर कैग ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि युद्ध के समय एयरफोर्स के हवाई अड्डों की अहम भूमिका होती है, जबकि दुश्मन भी सबसे पहले हवाई अड्डों पर हमला करता है। लेकिन वायुसेना के ज्यादातर हवाई अड्डों पर पहले से ही तैयारियों की कमी है। इनमें रनवे पुनर्वास प्रणाली बहुत पुरानी है।चार हवाई पट्टियों में तो 1976 में स्थापित की गई प्रणाली चली आ रही है, जिसमें लगे उपकरण संग्रहालय में रखने लायक हो चुके हैं। इससे नुकसान यह है कि यदि दुश्मन हमला करता है और यह क्षतिग्रस्त होती है तो इसे दुरुस्त करने में 24-36 घंटे लग जाएंगे, जबकि वायुसेना को तीन से छह घंटे में इसे दुरुस्त करने में समक्ष होना चाहिए। सीएजी ने कहा कि वायुसेना के हवाई पट्टियों की स्थिति देखने से लगता है कि उसकी तैयारियां आधी-अधूरी हैं। यदि इन हवाई पट्टियों पर दुश्मन की बमबारी होती है तो उनकी मरम्मत करने में काफी समय लग जाएगा। दूसरे, हवाई जहाजों की निगरानी, ईंधन भरने की प्रक्रिया, उनमें हथियारों को लोड करने आदि में भी देरी हो सकती है। हवाई पट्टियों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में देरी की मुख्य वजह उपकरणों की खरीद में विलंब होना है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने वायुसैनिक अड्डों के आधुनिकीकरण के लिए 1220 करोड़ की योजना शुरू की जिसमें 86 फीसदी हवाई अड्डों में नया सिस्टम लगाया जाना था, लेकिन इसमें से 50 फीसदी काम ही पूरा हो सका है। इसकी मुख्य वजह उपकरणों की कमी है, हालांकि कई जगहों पर उपकरण लगे हैं, लेकिन वहां कार्मिकों की भारी कमी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़ाकू विमानों के उड़ान भरने वाले इन हवाई अड्डों पर जहां 18 प्रकार की मशीनों को संचालित करने के लिए 31 यांत्रिक कर्मी होने चाहिए, वहां नौ हवाई अड्डों पर महज एक-एक कर्मी तैनात पाया गया। इन हवाई अड्डों पर 204 कार्मिकों के मुकाबले कुल नौ कार्मिक वायुसेना ने तैनात किए थे। इसे गंभीर लापरवाही माना गया है।