Rakhi Hajela
राजधानी जयपुर देशी विदेशी पर्यटक यहां आ रहे हैं लेकिन दुनिया भर की संस्कृतियों को खुद में समेटे जयपुर डॉल म्यूजियम पर्यटकों के लिए तरस रहा है। ऐसे में अब इसे पर्यटन विभाग की मदद से विश्व मानचित्र पर लाने की कवायद की जाएगी। जिससे जयपुर आने वाले पर्यटक यहां भी विजिट कर सकें। इस म्यूजियम में भारत सहित 40 देशों की गुड़ियाएं प्रदर्शित की गई हैं।
पर्यटन विभाग की मदद लेगा स्कूल प्रशासन
पोद्दार मूक बधिर स्कूल परिसर में संचालित म्यूजियम के प्रति पर्यटकों का आकर्षण बढाने के लिए स्कूल प्रशासन पर्यटन विभाग को पत्र लिखेगा जिससे शहर के अन्य पर्यटन स्थलों की तरह इसका भी प्रचार प्रसार हो सके और अधिक से अधिक पर्यटक यहां आए। वर्तमान स्थिति की बात करें तो महीने में एक बार किसी ना किसी स्कूल के बच्चे यहां विजिट के लिए आते हैं साथ ही पर्यटकों की संख्या 15 से20 तक ही रहती है। यानी विजिट करने वालों की संख्या बेहद कम है।
डॉल म्यूजियम में दो इंच की गुड़िया भी
संग्रहालय की हर गुड़िया अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की संस्कृति को उजागर करती है। इन डॉल्स के जरिए संबंधित देश की संस्कृति, सभ्यता, पोशाक, व्यवसाय, रीति-रिवाज और उस देश के नागरिकों के मनोविज्ञान की जानकारी मिलती है। यहां जापान, अरब, स्वीडन, स्विटज़रलैंड, अफगानिस्तान, ईरान, अमेरिका, ब्रिटेन, बल्गारिया, स्पेन, डेनमार्क, मिस्र, जर्मनी, ग्रीस, मेक्सिको, आयरलैण्ड जैसे देशों की गुड़ियाएं विभिन्न आकार, वेशभूषा से सजी हैं। भारत की बात करें तो यहां पर अलग-अलग राज्यों की सांस्कृतिक झलक दिखाती डॉल्स मौजूद हैं। इसके अलावा राजस्थान की पारंपरिक कठपुतलियां भी हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आसाम, बंगाल, नागालैण्ड, बिहार के संथाल, आदि प्रदेशों के स्त्री-पुरुषों की पोशाकों में सजी-धजी गुड़ियाओं के युगल देखते ही बनते हैं। डॉल म्यूजियम में सबसे छोटी डॉल 2 इंच की है। वहीं कई प्रकार के कार्टून और सुपरहीरो कैरेक्टर्स की डॉल्स भी यहां देखने को मिलती हैं। जापान की प्रसिद्ध डॉल हिना मास्तुराई डॉल भी हैं। इसके अलावा अरब, स्वीडन, स्वीट्जरलैंड, अफगानिस्तान, ईरान आदि देशों की गुड़ियां गैलेरी में रखी गई हैं।
1974 में रखी गई थी आधारशिला
म्यूजियम की आधारशिला 7 दिसंबर 1974 को कांति कुमार पोद्दार ने रखी थी। पहले भगवानी बाई सेखसरिया गुड़ियाघर नाम दिया था। 2014 में भंडारी चैरिटेबल ट्रस्ट ने एक अतिरिक्त हॉल बनाते हुए इसका रिनोवेशन और रखरखाव का जिम्मा उठाया।
रखरखाव पर खर्च होता है शुल्क
वर्तमान में छात्र 10 रुपए, वयस्क 20 रुपए और विदेशी मेहमान 100 रुपए का शुल्क देकर इसे विजिट कर सकते हैं। जमा हुआ शुल्क इसी म्यूजियम के रखरखाव पर खर्च होता है।
इनका कहना है
डॉल म्यूजियम में आने वाले पर्यटकों की संख्या काफी कम है। हम पर्यटन विभाग की मदद से इसका प्रचार प्रसार करना चाहते है। इसके लिए विभाग को पत्र लिखा जा रहा है जिससे पर्यटक इस म्यूजियम में बारे में जान सकें और यहां भी विजिट करें।
भरत जोशी, प्रिंसिपल
पोद्दार मूक बधिर स्कूल।