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स्त्री सौम्यता छोड़कर पुरुष जैसा बनना चाह रही, बुद्धि के बजाय मन की ताकत से जीना होगा: गुलाब कोठारी

Gulab Kothari Editor-In-Chief Of Patrika Group: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा है कि स्त्री व पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, दोनों अलग-अलग नहीं हो सकते। चिंता की बात यह है कि आज की शिक्षा ने दोनों को अलग-अलग कर दिया।

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Gulab Kothari ji

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो पत्रिका

DD Rajasthan Program: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा है कि स्त्री व पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, दोनों अलग-अलग नहीं हो सकते। चिंता की बात यह है कि आज की शिक्षा ने दोनों को अलग-अलग कर दिया। दोनों अपनी-अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जी रहे हैं। एक-दूसरे के लिए जीने को तैयार नहीं हैं। कोठारी ने कहा कि पुरुष की पूर्णता स्त्री ही है लेकिन एक तरफ पुरुष का पौरुष भाव, आक्रामक भाव बढ़ रहा है जबकि स्त्री सौम्य होने के बावजूद अपनी सौम्यता को छोड़ पुरुष के जैसे ही रहना चाह रही है। उसे मन की ताकत से जीना चाहिए लेकिन वह बुद्धि की ताकत से जीना चाहती है।

कोठारी ने गुरुवार को दूरदर्शन के डीडी राजस्थान चैनल के विशेष कार्यक्रम 'अलबेलो राजस्थान' में संवाद से सृजन की थीम पर आधारित साक्षात्कार में यह बात कही। उन्होंने आज की शिक्षा प्रणाली, मां की भूमिका, मीडिया की भूमिका तथा तकनीक के दौर में आए बदलाव से जुड़े सवालों के खुलकर जवाब दिए। साक्षात्कारकर्ता मुकुल गोस्वामी व अनीशा सिंह थे।

कार्यक्रम के निर्माता कुलदीप चौधरी व राजसिंह थे। करीब एक घंटे के इस साक्षात्कार में कोठारी ने कहा कि पढ़ाई ने मां को उसकी भूमिका से अलग कर दिया है। हम तो आध्यात्म में जीते हैं और देश के सारे ग्रंथ आत्मा के स्तर पर जीने की बात करते हैं। जो भूमिका हमें ईश्वर ने दी है उसको मजबूत करना होगा। मानव को भी खुद को प्रकृति का हिस्सा मानकर जीना होगा तभी वह खुश रहेगा।

'शिक्षा को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकते'

शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कोठारी ने कहा कि शिक्षा को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकते। हमारे पुरुषार्थ की शुरुआत धर्म से है। हमारी विद्या की शुरुआत धर्म, ज्ञान, वैराग्य से है। इन्हें हटा दिया तो क्या बचा अर्थ व काम। हमें शिक्षा को बदलना पड़ेगा। एक सवाल के जवाब में कोठारी ने कहा कि स्कूल-कॉलेजों में व्यक्तित्व निर्माण नहीं हो रहा, इसीलिए मानव की संवेदनाएं खत्म होती जा रही है। जो लोग बुद्धि के मामले में पखर माने जाते हैं, उनमें भी संवेदनाएं लुप्त होती जा रही है।

'जनता और तीन स्तंभों के बीच मीडिया है सेतु'

पत्रकारिता को संवाद का माध्यम बताते हुए कोठारी ने कहा कि संवाद आत्मा का विषय है। अभिव्यक्ति का अर्थ भी यही है कि हम दूसरों की स्वतंत्रता को समझें और अपनी स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष करते रहें। तभी हम पत्रकार बन सकते हैं।

पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश ने यही सिद्धांत हमें जन्मघूंटी के रूप में दिए हैं। उन्होंने मीडिया को खुद को चौथा स्तंभ प्रचारित करने को भी अनुचित बताया और कहा कि मीडिया सिर्फ जनता और लोकतंत्र के तीन स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सेतु होना चाहिए। पत्रिका यहीं कर रहा है। कोठारी ने अपने पत्रकारिता के शुरुआती दौर के संस्मरण साझा करते हुए कहा कि उन्होंने पूरे प्रदेश की यात्रा कर यहां की परम्पराओं, फसलों, जातियों आदि को गहराई से समझा और यह पाया कि राजस्थान पुरुषार्थी व अनुशासित लोगों का प्रदेश है।

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