JLF 2023- जिदंगी में हमेशा छोटी छोटी खुशियों को एन्जॉय करना चाहिए। ईमानदारी और मेहनत से काम करें तो यह आपको जीवन में सफलता जरूर देंगी। यह कहना है लेखिका सुधा मूर्ति का। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीडिया से रूबरू होते हुए सुधा मूर्ति ने कहा कि पावर और मनी इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं। अगर आप जिंदगी को समझेंगे तो आपको कोई भी डिस्ट्रेक नहीं कर पाएगा। इसके लिए आप में मजबूत इच्छाशक्ति होनी चाहिए। हालांकि इस दौरान सुधामूर्ति ने मुगल टेंट विवाद पर कुछ भी बोलने से बचती हुई नजर आईं।
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14 साल तक बच्चों को रखें मोबाइल से दूर
उनका कहना था किकोरोना के बाद इंसान की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। छोटे बच्चों की जिंदगी सबसे ज्यादा डिस्ट्रेक हो रही है। ऑनलाइन क्लास और गैजेट्स की वजह से उनकी आंखों पर भी इसका असर पड़ रहा है। यह हालात पूरे देश में हैं। बच्चों को गेजेट्स के बजाए किताबें पढऩी चाहिए, क्योंकि गेजेट्स बच्चों को डिस्ट्रेक्ट करते हैं। बच्चों को 14 साल तक गेजेट्स से दूर रखें उन्हें किताबें पढऩे के लिए प्रेरित करें। 14 साल बाद उन पर छोड़ दें कि वो किताबें पढ़ता चाहते हैं या नहीं। उनका कहना था कि पिछले कुछ वक्त से आम लोगों की पढऩे की आदत छूट गई है। हम लोग किताब नहीं पढ़ते,लेकिन किंडल पर जानकारी ढूंढते हैं। जो किंडल पर नहीं ढूंढते वह विकिपीडिया पर ढूंढते हैं। आम लोगों की नॉलेज इक_ा करने की आदत अब भी बरकरार है। तरीका बदल गया है।
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मेरे लिए भारत में रहना गर्व की बात
भारतीय स्टूडेंट्स के विदेश में पढऩे और नौकरी के सवाल पर सुधामूर्ति ने कहा. मैं इस मामले में कुछ नहीं कह सकती, क्योंकि मेरे खुद के बच्चे भी विदेश में सेटल हंै। कोई बच्चा विदेश जाकर पढ़े या नौकरी करे। इस मामले में उनके परिवार को ही फैसला लेना होता है। उन्होंने कहा कि बस यह कहना चाहती हूं कि बच्चे जहां भी हों, उन्हें भारतीय कल्चर की जानकारी होनी चाहिए। अगर विदेश में बच्चे होंगे,तो मुश्किल होता है। यही जीवन चक्र है। मेरे लिए भारत में रहना और भारतीय होना गर्व की बात है।
प्रधानमंत्री की सास के नाम से जानते हैं लोग
सुधामूर्ति ने दामाद ऋषि सुनक के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने पर कहा,इससे मेरे जीवन पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। ये जरूर है कि लोग अब उन्हें ब्रिटेन पीएम की सास के नाम से भी जानते हैं। उनका नजरिया भी बदला है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पीएम होने नाते ऋषि सुनक के पास भले ही बाउंसर ना हो, लेकिन उनके पास जरूर हैं। हालांकि सुधामूर्ति ब्रिटेन की पॉलिटिक्स पर कुछ पर भी बोलने से बचती नजर आई। उन्होंने कहा कि अपने दामाद से सिर्फ कुशलक्षेम पूछने तक ही बातचीत होने का जिक्र किया।
45 साल से कर रही लेखन
सुधामूर्ति ने कहा कि वो 45 साल से लिख रही हैं। 2002 में पहली इंग्लिश की बुक आई थी। तब से इंग्लिश में लिख रही हैं। इससे पहले कन्नड़ में ही लिखा करती थी। किताबें लिखने की सीमा और सोच बहुत ज्यादा है। एक लेखक के तौर पर लगता है कि जेएलएफ बड़ा प्लेटफॉर्म है। एक लेखक के तौर पर लगता है कि जेएलएफ के बड़ा प्लेटफॉर्म है। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग वक्ताओं की ओर से की गई अलग.अलग विषयों पर की गई चर्चा का भी जिक्र किया। साथ ही कहा कि लिटरेचर स्टूडेंट्स के लिए यहां साहित्य की काफी वैरायटी है। जब उनसे लंदन में होने वाले जेएलएफ में जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जब ऑरिजनल जेएलएफ यहां है तो वो वहां क्यों जाएंगी। जहां तक पॉलिटिकल सवालों की बात है तो उसमें उनकी कोई रुचि नहीं है वो सिर्फ अपने काम को एंजॉय करती हैं।