देश विदेश में बढ़ी गुलाल गोटे की डिमांड
निशि जैन / जयपुर। गुलाबी नगर बसने के समय से गुलाल गोटे केवल पूर्व राजपरिवार और ठिकानेदार ही इस्तेमाल किया करते थे। लेकिन आज गुलाल गोटे की प्रसिद्धि विदेशों तक पहुंच गई है। जिसके चलते विदेशों में गुलाल गोटों की मांग बनी हुई है। अमरीका, इंगलैण्ड, स्वीटजरलैंण्ड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाइलैण्ड आदि देशों के पर्यटक इसे खरीद कर ले जा रहे हैं।
जयपुर स्थापना से चली आ रही परंपरा
1727 में जब महाराजा जयसिंह द्धितीय ने जयपुर की स्थापना की थी। उस समय शाहपुरा के लखेर गांव से आमेर आये हुए इन कारीगरों के पूर्वज को मनिहारों के रास्ते में बसाया था। तब से लेकर आज तक यह गुलाल गोटा बनाने वाले कारीगर इस काम को करते आ रहे है। मनिहारों के रास्ते में स्थित परिवार गुलाल गोटा बनाने का काम होली का डांडा रोपने से करते है।
ऐसे बनते है गुलाल गोटे
जयपुर का गुलाल गोटा लाख से निर्मित है। 2-3 ग्राम लाख की छोटी-छोटी गोलियों को एक बांसुरीनुमा नलकी में लगाकर फूंक मारते हुए घुमाया जाता है। धीरे-धीरे यह गुब्बारे की तरह फूल जाता है। फिर धीरे से इसको नलकी में से निकालकर पानी भरे हुए बर्तन में रख दिया जाता है। फिर इसमें प्राकृतिक सुगधिंत गुलाल भरा जाता है। यह गुलाल अरारोट का बना होता है। यह एक दम हर्बल होता है। फिर इस पर कागज चिपका कर पैक कर दिया जाता है। तैयार गुलाल गोटा 15 ग्राम का होता है और यह कागज की तरह पतले होते है।
उपहार में देने का प्रचलन बढा
आजकल जयपुर वासी दूसरे शहरों में रहने वाले अपने संबंधियों को गुलाल गोटे के पैकेट उपहारस्वरूप भेजते है। यहां से भी कुछ लोग ऐसे है जो कि यहां से गुलाल गोटा खरीदकर दूसरें शहरों में होली मनाते है। गुलाल गोटा अहमदाबाद, सूरत, बडोदरा, मुबंई, नागपुर, पूना, आगरा , मथुरा, वृदावंन आदि जगहों पर भेजा जा रहा है। वहीं विदेशों में अमरीका, इंगलैण्ड , स्वीटजरलैंण्ड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाइलैण्ड जैसे देशों तक लोग इसे ले जाते है।
हिन्दू-मुस्लिम सदभाव का प्रतीक
इंटरनेशनल यनेस्को अवार्ड से सम्मानित गुलशन सुल्ताना का कहना है कि गुलाल गोटा हिन्दू-मुस्लिम सदभाव व आपसी सहिष्णुता का प्रतीक है । राजशाही के जमाने से यह परपंरा चली आ रही है। आज भी लोग इससे होली खेलना ज्यादा पसंद करते है।