
सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों पर 'कबीरा खड़ा बाजार में' से कसा तंज
जयपुर। संत कबीरदास अपने समय के समाज सुधारक, कवि और निर्गुण उपासक थे। उस दौर में व्याप्त धार्मिक आडंबरों के बीच समाज को सच्चाई का मार्ग दिखाने के लिए उन्होंने अपनी ओर से भरसक प्रयास किए। रविवार शाम को रवीन्द्र मंच के मुख्य सभागार में कबीर की वाणी पर लिखे भीष्म साहनी के प्रसिद्ध नाटक 'कबीरा खड़ा बाजार में' का मंचन किया गया। राम सहाय पारीक के निर्देशन में कलाकारों ने कबीर की ही तरह सीधे-सरल संवादों में अपने-अपने किरदारों को मंच पर जिया। डॉक्टर शंकर पारीक के संगीत से सजे 'मोको कहां ढूंढे रे बंदे', 'झीनी-झीनी चदरिया' और 'पत्ता टूटा डाल से' जैसे गीतों के बीच नाटक के जरिए कबीर की शिक्षाओं और दर्शन पर प्रकाश डाला गया।
नाटक कबीर के कालातीत ज्ञान और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि की पड़ताल करता है, जिन्होंने प्रेम, सद्भाव और आंतरिक सत्य की खोज की राह दिखाई। कसे हुए कथानक, दमदार संवादों और कबीर की शिक्षाओं को वर्तमान समय में प्रासंगिक और सुलभ तरीके से व्यक्त करने की क्षमता के लिए दर्शकों ने भी नाटक को खूब सराहा।
Published on:
02 Jul 2023 09:25 pm
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