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कहानी – बेनतीजा आखिरी कुश्ती

मायूस थे दिल्ली के दोनों पहलवान। ग्यारह सौ रुपए के इनाम की आखिरी कुश्ती बराबर पर छूटी। 550 रुपए नगद सांवड्य़ा को मिले। भीड़ ने उसे कंधों पर उठाकर घुमाया।

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कहानी - बेनतीजा आखिरी कुश्ती

कहानी - बेनतीजा आखिरी कुश्ती

हरि राम मीणा

गांव में आयोजित कुश्ती के दंगल में दिल्ली के प्रसिद्ध हनुमान अखाड़ा के दो पहलवान भी आए थे। गौरे-चिट्टे, गदराए शरीर, सुंदर नाक-नक्श। दर्शकों और अन्य पहलवानों के लिए ये दोनों शख्स आकर्षण का केन्द्र बने हुए थे। इन दो में से छोटे पहलवान ने एक कुश्ती जीत ली। दूसरा पहलवान आखिरी कुश्ती के लिए अखाड़े में सांड की तरह मिट्टी उड़ा रहा था। उसके सामने कोई पहलवान खडा़ होने की हिम्मत नहीं कर रहा था। बात यह नहीं थी कि वह ताकतवर था। असल में दिल्ली के पहले पहलवान ने कुश्ती में जो दाव-पेच लगाए, उनके आगे भरतपुर के पहलवान की भी नहीं चली और वह चित्त हो गया था। हालांकि देखने में उसका शरीर अधिक सधा हुआ और जौमदार लग रहा था। लग यही रहा था कि दिल्ली के इस बड़े पहलवान के दावपेच तो और भी तगड़े होने चाहिए। लडऩे से पहले ही हार-जीत की यह पक्की सी संभावना सबके दिमाग में थी।

सांवड्य़ा अपने जमाने का माना हुआ आंचलिक पहलवान रह चुका था। वह देसी पहलवान ही सही, अगर उसे बुलाया जाए तो वह इस दिल्ली वाले से भिड़ जरूर जाएगा, हारना-जीतना अलग बात। कम से कम आखिरी कुश्ती निर्विरोध तो नहीं छूटेगी। निर्विरोध का मतलब दंगल की नाक कटना। यह नाक भी दंगल की नहीं, बल्कि पूरी बस्ती की और बस्ती के साथ इलाके की। यही सब कुछ सोच-भांप कर लिछमीनारायण पटेल ने ऐलान किया- 'सुणो भई सभी पंच-पटेल-पहलवान अर न्याहां (यहां) मोजूज (मौजूद) सबी भाई सुणों, या बस्ती की तरफ सूं सावंड़्यो पहलवान आखिरी कुश्ती लड़ेगो।' लिछमीनारायण पटेल ने पास में बैठे गिर्राज को कहा -'जा रे, बा कू बुला ल्या। खी ज्यो, बस्ती की बात राखणी है। तो कू पटेल ने अबी बुलायो है।'

सांवड़्या की उम्र कोई पचास के लग्गे-ढग्गे होगी। जैसा गुण-रूप वैसा नाम। गहरा सांवला रंग, गोल चेहरा, कुछ दचकी हुई चौड़ी नाक, घनी खिचड़ी मूंछें, सिर के छोटे छोटे बाल, थोड़ा भारी मगर कसा हुआ बदन। लाख अभावों के बावजूद कजरारी आंखों में एक प्रकार की चमक और मुस्कराहट। लांघ चढी हुई धोती। माथे पर सफेद रंग की मैली पगड़ी और पगड़ी के ऊपर कसकर बंधा हुआ गमछा। बंडी या कुर्ता वह कभी नहीं पहनता था। हां, उसके पास कपड़े की घुंडियों (बटन) वाली एक अंगरखी जरूर थी जिसे वह शादी-ब्याह या रिश्तेदारी में जाता तब ही पहना करता था। इसके अलावा उस अंगरखी को तह करके घर की अलगनी पर रख देता था।

हंडूकड़ी के दिन भी वह गांव में न होकर अपने खेत पर था जिसमें गन्ने की फसल रोपनी थी। खेत को उसने तैयार कर लिया था और बीज के लिए गन्ने की साई भी किसी गांव में कर आया था। उसके पास समय कम था। करीब दो बीघा के खेत की कच्ची डोल (मेंड) बनानी थी। घरवाली और चार बेटों के लाख मना करने पर भी वह गांव में नहीं रहा उस त्योहार के दिन। त्योहार से बड़ा उत्सव उसके लिए खेत था। खेत पर काम करते हुए सांवड़्या को गिर्राज भाग कर दस-पंद्रह मिनट में दंगल स्थल पर ले आया। उसे देखकर अखाड़े के इर्द-गिर्द जमा भीड़ ने ठहाका लगाया। यह ठहाका सांवड़्या की पहलवानी का मजाक कतई नहीं था, चूंकि सांवड्य़ा के करतब जगजाहिर थे। असल बात यह हुई कि सावंड्य़ा जैसे था वैसे ही आ गया। हाथ पैर गारे में सने हुए, बदन पसीने में तरबतर, धोती की लांघ चढ़ी हुई, तोंगली में तम्बाकू की थैली ठुसी हुई, सिर पर पगड़ी के ऊपर भींच कर बांधा हुआ गमछा।

लिछमीनारायण पटेल का इशारा देखकर सांवड़्या कुश्ती के अखाड़ा में उतरते ही वहां पहले से हथेलियों को मसल रहे दिल्ली वाले पहलवान की तरफ मुखातिब होकर बोला 'हां भई पहलवान, आ जा। देख, दाव-पेच तो मैं जाणूं कोनी। हां, या ढ़लती उमर में बी काया पे थोडो़ भरोसो जरूर है। देखां, ऊंट कांई कड़ोट (करवट) बैठेगो'।
'ये कोई बात है। इस तरह कैसे कुश्ती लड़ी जाएगी? यह कीचड़ में सना हुआ गंवार आदमी मुझा जैसे नामी पहलवान से लड़ेगा। यह तो सरे आम मेरी बेइज्जती है। अगर आप को कोई पहलवान नहीं मिला तो इसे सामने खड़ा कर दिया। सवाल मेरी जीत का नहीं, बात यह है कि हम इतनी दूर से यहां आए हैं दंगल का बड़ा नाम सुनकर और आप हमें बेइज्जत कर रहे हो।' - दिल्ली का पहलवान तुनका।
लिछमीनाराण पटेल समझा गया कि निर्णायकों समेत सबकी नजरें उसी की ओर हैं। उसने सांवड़्या से कहा - 'इरे सांवड़्या, या गारा-फारा कू तो पूंछ बाड़ ले। अर, पागड़ी-गमछा कू हटा दे। घोती कूं लंगोट की नाई कस ले। ढीली छोड़ेगो तो थारो ही नुकसान है।'

आखिरी पंक्ति को सुनकर कुछ युवकों ने जोरदार ठहाका लगाया। समझदार आदमियों ने उस ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया। छोटे बच्चे इसे समझा न पाए। सांवड़्या ने पटेल की बात मानी और पगड़ी व गमछा हटाकर उसी की और फेंक दिया। अब धोती की तोंगली में से तम्बाकू की थैली भी निकाली और गांठ देकर उसे अपने बेटे किशोरा की तरफ फेंक दी, यह कहते हुए कि - 'ले रे छोरा, संभाड़ ज्यो' और धोती को ढीली कर के फिर से कस कर बांध लिया जैसे वह लंगोट हो और पहलवान से कहा - 'आ जा भई बहुत देर हो गई। मोकूं काम भी करणो है।'
दंगल के दो निर्णायकों में से एक खेड़ली वाले अमरा गूजर ने कार्यवाही चालू की - 'हां तो सब भाई सुणे, चतुरसिंह पहलवान दिल्ली और सांवड़्या मीणा पहलवान बामणोंस। कुश्ती शुरू हो।'

सबने तालियां बजाईं। चतुरसिंह ने अखाड़ा का एक चक्कर लगाया। अखाड़ा की माटी से हाथ मले और थोड़ी माटी ललाट पर लगाई। सांवड्य़ा ने एक ही जगह खड़े खड़े जमीन पर माथा टेका और एक नजर अखाड़ा के चारों और बैठी-खड़ी भीड़ पर पसारी। फिर जांघें फटकार कर कहा-'अब आजा भई पहलवान।'
सांवड्य़ा पुराने दाव-पेच भूल चुका था। इसलिए अंगद की तरह खड़ा रहा। चतुरसिंह काफी देर तक हाथ-पांव मारता रहा। खम्बे की तरह अडिग सांवड्य़ा के सामने चतुरसिंह को अखाड़ा की सारी सिखलाई लाचार बेकार दिखने लगी। सांवड्य़ा एकाध बार पड़ा, लेकिन फिर खड़ा का खडा़। ऐसा लग रहा था जैसे वह चतुरसिंह और सांवड्य़ा पहलवानों की कुश्ती न होकर राजधानी दिल्ली की भद्र चतुर चालाकी से पूर्वी राजस्थान के लोक की कुश्ती हो। बार बार चतुर और चालाक दाव-पेच हावी हो रहे थे मगर सीधा साधा सावंड्य़ा अपने बलबूते अपनी जमीन पर गिरता-उठता ठूंठ की तरह हर बार खड़ा ही दिखा। चित्त तो नहीं हुआ। आखिर में, बराबरी पर कुश्ती का फैसला करना पड़ा। निर्णायक, पंच-पेटल, अन्य पहलवान, लिछमीनारायण पटेल और अंचल के दर्शक गद्-गद् हो गए। मायूस थे दिल्ली के दोनों पहलवान। ग्यारह सौ रुपए के इनाम की आखिरी कुश्ती बराबर पर छूटी। 550 रुपए नगद सांवड्य़ा को मिले। भीड़ ने उसे कंधों पर उठाकर घुमाया।


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